रविवार, मार्च 25, 2012

लोकराग में भीगा मन

लगभग 19वीं शताब्दी के बाद वैज्ञानिक विकास की समूची अवधारणा को मनुष्य केंद्रित बना दिया गया। जितना संभव हो सका उतना प्रकृति व प्राकृतिक संसाधनों की लूट हुई। पेङों, पहाङों, नदियों, खेतों – खलिहानों, जंगलों, जमीन व आसमान को मनुष्य के विकास के नाम पर रौंद दिया गया। आधुनिकीकरण, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के तीव्र और अंधी घुङदौङ ने प्रकृति के साथ हमारे संबंध और सहकार को छीन लिया। विज्ञान और प्रौद्यौगिकी को प्रकृति के खिलाफ जबरन इस्तेमाल किया। यही कारण है कि हम भीतर से प्रकृतिविहीन और उजङे हुए जीवन जीने को मजबूर हुए। शायद हम याद भी नहीं कर पा रहे कि हमने प्रकृति के साथ क्या – क्या खो दिया। हमारे जीवन से प्रकृति, उसका अप्रतिम सौंदर्य, ऋतुओं का वैभव एवं उसका स्वाभाविक ऋतुचक्र, रंगीनियां, लोकरंग, रसरंग, रागरंग कब गायब हो गया पता ही नहीं चला। समकालीन कवियों – लेखकों में भी प्रकृति और उसके वैभव का वह ठाठ उठ गया जो कभी संस्कृत साहित्य, मध्यकालीन हिंदी साहित्य या छायावादी कवियों में दिखाई पङता है। ऐसे में राजकिशन नैन की निबंधात्मक पुस्तक ‘लोक में ऋतु’ न सिर्फ पठनीय व विचारणीय है बल्कि प्रशंसनीय भी। क्योंकि वे उपर्युक्त वैश्विक और स्थानीय मुद्दों और समस्याओं को अलग – अलग संदर्भों में उठाते हैं।
राजकिशन नैन का मन लोकराग में भीगा है। वे लोक के गहरे जानकार और चितेरे हैं। पेङ – पौधे, जंगल - नदी, पशु – पक्षी, पर्व – त्योहार, फूल – फल, प्रकृति का सृजन, संहार और पुनर्सृजन को उन्होंने जितना कैमरे की आंख से देखा है उससे ज्यादा उसमें डूब – उतरा के। उन्होंने प्रकृति, ऋतुएं, लोकजीवन, ग्राम्यगीत, प्रेमगीत, ऋतुगीत, लोकपर्व एवं त्योहार आदि को भाषा में मूर्त्त कर दिया है। फोटोग्राफी के व्यवसाय ने उन्हें हर चीज को दृश्य बना देने का सामर्थ्य दिया। वे प्रकृति के हर दृश्य को कैमरे में कैद करने की नजर से देखते हैं। यही कारण है कि कैमरे की बाहर की दुनिया भी बेहद निराली व आकर्षक है। उन्होंने लोकजीवन व प्रकृति की रंगिनियों को पूरे कलात्मक औदात्य के साथ पन्नों पर उतारा है। हरियाणी प्रकृति और लोक का विराट वैभव और विपुल संपदा को यहां ठाठ से पढ़ा और महसूस किया जा सकता है। उनके निबंध कई बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और विद्यानिवास मिश्र की याद दिलाते हैं। प्रकृति वर्णन द्विवेदी जी के आसपास है तो लोक की अंतरंगता विद्यानिवास के साथ तादात्मय बनाता है।
राजकिशन नैन की पुस्तक में प्राकृतिक सुषमा व लोकजीवन का जो ठाठ उभरा है वह हरियाणा प्रदेश का है। उनके संस्मरणात्मक अनुभव ने हरियाणा के लोकजीवन व प्रकृति का इतिहास रच उसे संरक्षित किया है। अरावली की सुरम्य पहाङियां, हरे – भरे समतल मैदान, उफनती - भागती नदियां, बालू के सुनहरे टीले। संरक्षण का यह भाव ऋतु दर ऋतु दिखाई पङता है। वसंत की मादकता, फगुनाहट, शिरीष के फूल, ढाक के दहकते पुष्प, पलाश के धधकते सूर्ख अंगार जैसे जंगल, शहतूत, चंपा, नीम, आम्र मंजरियों की मदमाती महक, महुए की ठर्राती गमक, फाल्गुनोत्सव के उत्साह और मादकता तो जेठ की दहाङ भी सुनाई पङती है। उसकी दारुण – दाहक, तुनकमिजाजी और बेहया रूपों का भी उदघाटन होता है। ऋतुओं की रानी वसंत जेठ से थरथर कांपती है। यह कोयल की मधुर तान की भी बेकद्री करती है। उसके उग्र स्वभाव से वरुण ही बचाता है। राजकिशन कहते हैं वरुण ही मुझमें आनंद और उमंग भरता है। जेठ के मिजाज को कभी सूखा तो कभी तीखा बताते हैं। उससे बचने के लिए उन्हें तरबूज, खरबूजा, आम का पन्ना, सत्तु, छाछ, गुङ का रस याद आते हैं, जो धीरे – धीरे हरियाणा प्रदेश से गायब हो रहे हैं और उसकी जगह मल्टीनेशनल कंपनियों के पेय पदार्थ कोक – पेप्सी जगह बनाते जा रहे हैं।
राजकिशन वर्षा ऋतु को धरा और मनुष्य को बल प्रदान करने वाले ऋतु मानते हैं। पावस के सुन्दर फूलों कमल, मेंहदीं, हरसिंगार और रात की रानी के बगैर उनकी बात अधूरी रह जाती है। सावन के गीतों और भाव लहरियों को वक्त के धूंधलके में खो जाने की टीस भी गूंजती है। वे शरद की खूबियों को लोकोत्तर बताते हैं। उसके पीतवर्णी इच्छाओं और सतरंगी दुनिया को खोलते हैं। हेमंत के हरे दुपट्टे ओढ़ लेने के दृश्य को साकार करते हैं। उसके विपूल वैभव और रूप सौष्ठव की ख्याति को दृश्यमान करते हैं। ऋतुओं की साम्राज्ञी शिशिर को एक तरफ संभावनाओं का तो दूसरी तरफ जानलेवा भी कहते हैं।   
आम तौर पर यह देखने को मिलता है कि लेखकों ने प्रकृति वर्णन करते हुए मनुष्य की केंद्रीयता को बनाए रखा है। राजकिशन भी ऐसा करते हैं। प्रकृति की हरकतों, स्वभावों एवं गति को मानवीय भावों एवं स्वभावों से जोङते हैं। बाबजूद इसके वे ऋतुओं की स्वायतता एवं स्वतंत्र सत्ता को भी उदघाटित करते हैं। उसकी विशेषताएं, स्वभाव, जीवनशैली, प्राकृतिक वैभव, सौंदर्य, कलात्मक अभिव्यक्ति, आतंरिक अनुशासन, बदलाव, सृजन, विनाश और पुनर्सृजन, को सर्जनात्मक तरीके से रखते हैं। उसकी आवयविक और नैसर्गिक संरचना का बखान करते हैं। ऐसा करते हुए वे पेङ, पौधे, फूल, - फल, जंगल – जमीन, नदी – पहाङ, जोहङ, ओस - धूंध, बादल और धूप सब से बतियाते हैं। प्रकृति को अराध्य की तरह मानते – पूजते हैं। प्रकृति को केवल ऋतुओं की मां नहीं बल्कि अपनी मां मानते हुए – ऐसा समझने पर बल देते जान पङते हैं। प्रकृति को सेविका, सहचरी और शिक्षक का भी दर्जा देते हैं। वे प्रकृति की आध्यात्मिकता को उदघाटित करते हैं। वे लिखते हैं ‘हमारा शरीर जिन पांच तत्त्वों का पुतला है, वे हमें प्रकृति से मिले हैं’। इसलिए उसकी अखंडता के संरक्षण के प्रति उनमें तङप भी है। वे मानते हैं कि प्रकृति के नियमों के संरक्षण में ही हमारा उत्थान है और उसके बिगाङ में ही पतन।         
       उदय प्रकाश की भाषा में कहें तो राजकिशन जी ने ‘ग्राम्य जीवन और ऋतुओं के घनिष्ठ संबंधों को समझा है। साथ ही वे प्रकृति की सभी विशेषताओं और बदलावों के साक्षी भी रहे हैं’। चाहे वह ऋतुओं का राजा वसंत हो, या ऋतुओं की रानी शिशिर, चौमासे के मानसूनी मेघ हों या लू - लपटों का मारू महीना जेठ हो, या फिर मादक मनोहर शरद ऋतु हो। सबके साथ उनका गहरा लगाव व तादात्मय है। वे प्रकृति के सभी रूपों की स्थूल एवं सूक्ष्म अंकन करते हैं। वे प्रकृति के निकट हैं और प्रकृति उनके निकट। उनका ह्रदय ऋतुओं की आगवानी के लिए दौङा पङता है। उनकी स्मृति में हरियाणा की प्रकृति, ऋतुएं एवं लोकजीवन तथा उसके मुहावरे, लोक गीत - संगीत आदि ताजा हैं। उन स्मृतियों के आख्यानात्मक प्रतिफलन के रूप में इस पुस्तक को देखा जा सकता है। लेकिन जिस तरह से हमारा अज्ञान प्रकृति को उजाङ रहा है। प्रदूषण नष्ट कर रहा है, बढ़ता उपभोक्तावाद और अतिरिक्त उत्पादन नष्ट करने पर उतारु है वह उनके लिए स्थायी चिंता के विषय हैं। 
पुस्तक – लोक में ऋतु
लेखक – राजकिशन नैन
प्रकाशक – आधार प्रकाशन, पंचकूला
मूल्य – 200 रुपये




शनिवार, जनवरी 28, 2012

प्रतिमान पुरुष की सीमाएं

      आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिन्दी के संस्था पुरुष हैं। वे हिन्दी के सबसे शक्तिशाली नैरेटर हैं। इतिहास, आलोचना, निबंध, लेख आदि हर जगह इसकी बानगी देखी जा सकती है। उनके विचारों की तार्किकता का समुच्चय इतनी शक्ति और आवेग के साथ प्रवाहित होती है कि पाठकों को अपने साथ बहा ले जाती है। उनके उदाहरण अकाट्य तर्क के साथ अपनी जगह बनाते चलते हैं। जो भाव, विचार, भाषा, लेखन, रचनाकार, धर्म आदि चीजें उन्हें पसंद नहीं उसकी धज्जियां उङा देते हैं। उनकी स्थापनाएं, निष्कर्ष, मूल्यांकन और असहमतियां उनकी सामाजिक – सांस्कृतिक – धार्मिक और साहित्यिक रूचियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। तमाम विवादों, उलझनों और वर्णवादी श्रेष्ठता बोध को झलकाने के बाद भी रामचंद्र शुक्ल का ऐतिहासिक महत्व और साहित्यिक अवदान काफी जगह घेरता है। उनसे असहमति जता कर ही परवर्ती साहित्येतिहास, आलोचना एवं उसकी विभिन्न धाराओं को विकसित किया जा सका है। 
पिछले वर्षों में जब से दलितों - पिछङों का उभार और हिन्दूवादी धार्मिक कट्टरता एवं सांप्रदायिकता सामने आयी है रामचंद्र शुक्ल का लेखन पुन: विवादों के घेरे में आ गया है। एक तरफ उनमें उभरे वर्णवादी – जातिवादी संरचनाओं पर सवाल उठाये जा रहे हैं दूसरी तरफ उनमें मौजूद हिन्दूवादी चिन्हों के मायने तलाशे जा रहे हैं। रामजी यादव द्वारा संपादित ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल संचयन’ को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए। रामचंद्र शुक्ल ‘नेशनलिस्ट’ विमर्शकार थे। श्रेष्ठ निबंधकार, अनुवादक भी। जिसकी झलक यहां नहीं दिखाई पङती है। रामचंद्र शुक्ल के रचनात्मक वैविध्य का यहां अभाव है। कहना न होगा, इसे बेहतर संचयन और संपादन नहीं कहा जा सकता है। यह आचार्य शुक्ल के साहित्यिक अवदानों का श्रेष्ठ चुनाव नहीं है।
रामजी यादव द्वारा लिखी गई भूमिका भी हङबङी की शिकार है। उन्होंने रामचंद्र शुक्ल की एकतरफा आलोचना की है। यह आलोचना तात्कालिक सामाजिक – धार्मिक संरचनाओं और संस्थाओं के उभार के प्रतिफलन स्वरुप सामने आयी है। संचयनकर्त्ता से यह उम्मीद की जाती है कि वे संबंधित लेखक का मूल्यांकन समग्रता में करें। उनसे नये ‘पाठ’ की तस्दीक रहती है। संचयन या संपादन के उद्देश्य और निहितार्थ भी स्पष्ट हों। तब, जबकि उस लेखक की रचनावली और कई संचयन पहले ही प्रकाशित हो चुके हों।
रामजी यादव भूमिका में रामचंद्र शुक्ल के साहित्यिक – सांस्कृतिक प्रतिमान ‘लोकमंगल’ की आलोचना करते हुए उसे कुछ जातियों के कल्याण तक केंद्रित मानते हैं। फिर उसे हिन्दी विभाग के संकीर्ण और सङांध भरे परिवेश से जोङते हैं। फिर हिन्दी विभागों में दलितों - पिछङों – आदिवासियों, अल्पसंख्यकों की कम तादाद से। यानी वे शुरुआत ही कहां का रोङा, कहां का पत्थर, भानुमती का कुनबा जोङा वाले स्टाइल में करते हैं। फिर वे रामचंद्र शुक्ल और शुक्लोत्तर हिन्दी आलोचना में पाठ की मनमानी पर बहस करने लगते हैं। साथ ही यह निष्कर्ष भी चस्पां देते हैं कि शुक्ल ‘हिन्दी के पहले रूपवादी आलोचक’ लगते हैं। यहां हम देख सकते हैं कि रामजी यादव की भूमिका बेहद बेतरतीब, लचर और अनावश्यक रूप से ध्वंसात्मक है। बेहतर होता रामजी यादव ने शुक्लजी के व्यक्तित्व में जिन विरोधी छोरों को पहचानने की कोशिश की है, जिन विशेषताओं और नकारात्मक पहलुओं को देखने की कोशिश की है - दोनों पर संतुलन बनाकर आगे बढ़ते।   
संपादक इस बात पर बल देते हैं, जो उचित ही है कि शुक्लजी, हिन्दू गौरव को चुनते हैं – मनुष्य जाति के नहीं। वह भी तब, जब वे इस्लामिक कट्टरता, कठमुल्लापन और धर्मांतरण के विरुद्ध खङे हैं। ‘तुलसी के सौंदर्य और लोकमंगल पर पूरी पोथी लिखते हैं, वहीं कबीर को सस्ते में निपटाते हैं। मध्यकाल की सामाजिक क्रांति के बरक्स पतनशील सामंती मूल्यों को बङे फलक पर व्याख्यायित करते हैं’। वे शुक्लजी के भीतर फैले फांक पर से पर्दा उठा दिखाते हैं कि ‘हिन्दुत्ववाद और वर्णव्यवस्था जैसी नारकीय समाज व्यवस्था का समर्थन करने के साथ ही वे करुणा, संवेदना और लोकमंगल जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों की भी व्याख्या करते हैं। मीर और गालिब को हिन्दी से निकाल बाहर करने को सुनियोजित चाल बताते हैं। अंत में यह सवाल उठा छोङ जाते हैं कि एक परजीवी समाज की मूल्य व्यवस्था के प्रवक्ता होने के बाबजूद वे क्योंकर इतनी मजबूती से जमे हुए हैं !
संचयनकर्त्ता ने पुस्तक को आठ खंडों में विभाजित किया है। पहला खंड कविताओं का है। यह सर्वविदित है कि शुक्लजी का हाथ कविताओं में तंग है। उनकी कविताएं उनके तीव्र विचारों की पच्चीकारी है। उसमें छायावादी तत्समता का पूरजोर आग्रह है। छंद और तुक को साधने की भरपूर कोशिश। राष्ट्रीय चेतना, हिन्दी की गौरवगाथा के अलावा तुलसी के बहाने वर्णवादी श्रेष्ठता को सामने रखना उनकी कविताओं में शामिल है। वे एक तरफ देवकीनंदन खत्री के शोक में कविताएं लिखते हैं तो दूसरी तरफ छायावाद और निराला के विरोध में भी। यानी वे कविता और आलोचना में एक ही तरह के काम को अंजाम दे रहे थे।
दूसरा खंड कहानियों का और तीसरा पत्रों का है। पत्रों के चुनाव में संपादक ने सिर्फ इस बात का ध्यान रखा है कि हिन्दी के लेखकों के विवाद, पाठ्यपुस्तकों की राजनीति और जोङ –तोङ दिखे। हालांकि इससे उस समय के सत्य का पूरा उदघाटन नहीं होता, आंशिक झलक भर मिलती है। ‘सौंदर्य, भाषा और साहित्य शास्त्रीय विवेचन’ खंड में कविता क्या है, उपन्यास, साहित्य, अपनी भाषा पर विचार, उर्दू राष्ट्रभाषा, भाषा की उन्नति, भारतेंदु हरिशचंद्र और हिन्दी, हिन्दी और मुसलमान शामिल हैं। यह चयन अतार्किक है। इसे किसी दृष्टि से विवेकसम्मत नहीं कहा जा सकता। बेहतर होता भाषा विवाद के अलग खंड होते। शुक्ल जी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के पक्ष में थे न कि उर्दू, अरबी, फारसी के विरोध में थे। हालांकि वे हिन्दी में संस्कृत और उर्दू की उतनी ही जरुरत महसूस करते थे जितनी से भाषा बोझिल और लद्दङ न हो। शुक्लजी के एजेंडे में भारतेंदु थे न कि शिवप्रसाद सिंह सितारेहिंद। मूल्यांकन खंड में सूरदास, तुलसीदास और जायसी तथा जीवनी खंड में मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या, प्रेमघन, राधाकृष्णदास को शामिल किया है। इतिहास खंड में ‘गद्य साहित्य का प्रसार’ तक का हिस्सा है। यह खंड भी आधे – अधूरे ही शामिल है। बेहतर तो यह होता कि इस खंड में सिर्फ रीतिकाल या आधुनिक काल को शामिल किया जाता। सूर, तुलसी, जायसी को मूल्यांकन खंड में रखने के बाद भक्तिकाव्य को शामिल करने की जरुरत खत्म हो जाती है। भूमिका में जिस हिन्दूवादी बातों पर रामजी ने बल दिया है वह उसके शामिल होने से स्वत: स्पष्ट था। फिर वह निबंधों में भी व्याप्त है।    
         

रविवार, जनवरी 08, 2012

तुलसी काव्य - विमर्श

     नंदकिशोर नवल आधुनिक साहित्य के पाठक और आलोचक हैं। मध्यकालीन साहित्य उनके आलोचनात्मक - विमर्श का हिस्सा पहले नहीं रहा है। ‘तुलसीदास’ पर पुस्तक लिखकर उन्होंने अपने आलोचनात्मक दायरे को विस्तार देने की कोशिश की है। लेकिन उनका यह प्रयास मध्यकालीन साहित्य के एक पाठक के सहज उच्छलन का रूप नहीं है। उनकी परेशानी का सबब कबीर और उसके पाठक हैं जो उनकी रचनात्मकता से ऊर्जा पाते हैं। कबीर को अपना काव्यनायक मानते हैं और तुलसीदास को हाशिए पर रखते हैं। यही कारण है नंदकिशोर नवल कि यह पुस्तक नई पीढ़ी के उन पाठकों को संबोधित है जो तुलसी की तुलना में कबीर को श्रेष्ठतर मानते हैं और उसके प्रति ‘उपेक्षा – भाव’ रखते / प्रदर्शित करते हैं। 
   नंदकिशोर नवल प्राक्कथन में ही कबीर और उनके पाठकों पर छङी घुमा देते हैं। लिखते हैं -‘...कबीर हर तरह से परलोकवादी और योगमार्गी थे तथा स्त्री के संबंध में उनके विचार तुलसीदास से भी कटु थे, लेकिन नई पीढ़ी के लोग इसे नहीं देखते और कबीर के वर्ण – व्यवस्था तथा बाह्याचार – विरोध को ही लक्ष्य मानकर उन्हें सर्वाधिक अंक देते हैं’। यूं तो साहित्यकारों और आलोचकों की पुरानी पीढ़ी हमेशा से ही नई पीढ़ी को लेकर सशंकित और तंग नजर रही है। सच्चाई यह है कि हर युग में नई पीढ़ी अपना काव्यनायक स्वयं चुनती है। सामाजिक – राजनीतिक - आर्थिक परिवेश तथा उसकी हलचल और उससे निष्पन्न ऐतिहासिक बोध उसे दृष्टि प्रदान करते हैं जिसके आधार पर यह चुनाव संभव होते हैं। दलितों – आदिवासियों - पिछङों के उभार तथा धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक उन्माद से लहूलुहान दौर में अगर नई पीढ़ी वर्ण – व्यवस्था तथा बाह्याचार विरोधी कवि को सर्वाधिक अंक देता है तो कोई अन्याय नहीं है। बल्कि वक्त की नब्ज़ पर ऊंगली रखना है। इतिहास की धारा के साथ बहना है।
नंदकिशोर नवल का यह मानना भी कि नई पीढ़ी तुलसी काव्य की ताकत से परिचित नहीं है अतिकथन ही कही जायेगी। तुलसी का अब भी जनप्रिय कवि होना या ग्रामीण समाज के भीतर धंसा होना लोकप्रियता की ही निशानी है। समकालीन बौद्धिक जगत ने जरुर तुलसी काव्य की प्रासंगिकता को प्रश्नांकित किया है। अव्वल तो तुलसीदास कुछ असुविधाजनक सवालों के घेरे में हमेशा रहे हैं, लेकिन उससे उनकी साहित्यिक - सांस्कृतिक और धार्मिक लोकप्रियता क्षतिग्रस्त नहीं हुई है।
तुलसीदास पर लिखी यह पुस्तक प्रभाववादी आलोचना का ही एक उदाहरण है। बचपन से ही तुलसी साहित्य का जो प्रभाव लेखक पर पङा, उसी प्रभावान्निविति के दबाब के प्रतिफलन के रूप में इसे देखा जाना चाहिए। इसमें उनकी पाठकीयता, रसिकता और भावुकता शामिल है। लेखक अपने विवेचन में बार - बार इस बात को दोहराते हैं कि तुलसीदास श्रेष्ठ और महान कवि हैं। दूसरे शब्दों में, वे तुलसीदास की स्वयंसिद्ध श्रेष्ठता / महानता का पीछा करते हुए स्थापनाएं देते हैं। अगर आलोचनात्मक स्थिति इसके उलट होती तो उसे आदर्श माना जाता और तुलसी काव्य में नई ‘पाठ – संभावनाओं’ की तलाशी होती। लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। रामचंद्र शुक्ल के बाद रामविलास शर्मा ने अपने युग के परिप्रेक्ष्य में तुलसी को पढ़ने की कोशिश की। उन्होंने प्रगतिशील आंदोलन घटित होने के बाद तुलसी काव्य को श्रम, किसानी - वृत्ति, भूखमरी, जहालत, दुर्भिक्ष, वैयक्तिक और सामूहिक दुख के भीतर पढ़ा। प्रगतिशील और जनवादी मूल्यों को तुलसी में प्रस्थापित किया। लेकिन यहां ऐसा कुछ भी नहीं है। ऐतिहासिक बोध के अभाव में पुस्तक समकालीन चुनौतियों और परिप्रेक्ष्य से परे ‘तुलसी – काव्य’ का भाष्य या टीका भर बनकर रह जाती है।  
आलोच्य पुस्तक के दो - तिहाई हिस्से तुलसी - काव्य के उदाहरणों से पटे पङे हैं। ऐसे में विवेचन – विश्लेषण की गुंजाईश बहुत कम रह जाती है। समकालीन दुनियावी संदर्भों में उसकी प्रासंगिक स्थितियों का पाठ आकलन भी न्यून है। चुनिंदा पदों का ‘पाठ – विमर्श’ एवं अर्थनिष्पादन जरुर आकर्षित करते हैं।      
पुस्तक तीन अध्याय – ‘अन्य काव्य’, रामचरितमानस और विनयपत्रिका में विभाजित है। अन्य काव्य में उन्हीं रचनाओं पर विचार किया गया है जिसे विद्वानों ने प्रमाणिक माना है। आलोचक पहली रचना ‘रामलला नहछू’ को काव्य गुण से रहित और उल्लेख योग्य नहीं मानते हैं। संकेत करते हैं कि ‘रामलला नहछू में कहीं भी हमें एक महाकवि के आगमन की पदचाप नहीं सुनाई पङती’। ‘रामाज्ञा प्रश्न’ को शकुन – विचारने वाली पुस्तक मानते हैं। साथ ही दर्ज करते हैं कि शंबूक वध और सीता – वनवास दोनों की मौजूदगी यहां है जो ‘रामचरितमानस’ में नहीं है। एक महान साध्वी स्त्री के ऊपर लोक की महत्ता की बात प्रश्नांकित है। ‘बरवै रामायण’ में सीता के रूप वर्णन को रीतिकालीन मानते हैं। वे लक्षित करते हैं कि इन तीनों ‘खंड – काव्य’ में उसके अनुरूप शिल्प – विधान का कोई सौंदर्य नहीं है। 
लेखक ‘जानकीमंगल’ में सीता की उभरी हुई सेक्सुअलिटी का संकेत भर देते हैं। ‘पार्वतीमंगल’ की तुलना कालिदास की कुमारसंभव से करते हैं। साथ ही यह निष्कर्ष देते हैं कि कालिदास की दृष्टि मुक्त थी जबकि तुलसी की संयत। जहां कालिदास की काव्य संवेदना वन्य और नागर थी वहीं तुलसी की ग्रामीण। गीतावली और कृष्णगीतावली को कवि की बौद्धिक सहानुभूति की देन मानते हैं न कि अनुभूतियों का।
नंदकिशोर नवल ‘कवितावली’ में अत्यधिक परिपक्वता, सृजनात्मक कल्पनाशीलता और तज्जनित मन को मुग्ध कर देनेवाला सौंदर्य देखते हैं। साथ ही उसमें व्यक्त ‘पाठ’ के  यथार्थवादी स्वरुप का उदघाटन करते हैं। साहित्यिक एवं संगत शब्दार्थों तक पाठक को पहुंचाने की कोशिश करते हैं। ‘रामचरितमानस’ पर विचार करते हुए वे एक तरफ कबीर के प्रति उन्हीं पूर्वाग्रहों को ‘आक्रामक मुद्रा’ में सामने रखते हैं जो धर्मवीर के लेखन के पहले चलता रहा है दूसरी तरफ, तुलसी में मौजूद आपत्तिजनक उक्तियों के प्रति ‘रक्षात्मक मुद्रा’ अखित्यार कर ली है। तुलसी को डिफेंड करने के लिए यह कह देते हैं कि वे सब उक्तियां हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुवाद हैं। वे यह सवाल ही नहीं उठाते कि तुलसी अपनी ‘काव्य – दृष्टि’ में उसे क्यों शामिल करते हैं? ‘नारि हानि बिसेष छति नाहीं’ वाले प्रसंग के संदर्भ में तर्क देते हैं कि पत्नी के ऊपर भाई के महत्व देने को ‘किसान मानसिकता’ माननी चाहिए। इसके लिए पंत की कविता का उल्लेख भी करते हैं। यह बिल्कुल ही निराधार, असंगत और तर्कहीन तुलना है।
वे रामचरितमानस के सभी कांडों का अध्ययन क्रमबद्ध तरीके से करते हैं। बालकांड का नायक लक्ष्मण मानते हैं तो अयोध्याकांड के नायक भरत को। शूर्पनखा – प्रसंग को परवर्ती कथाओं का हेतु। सुन्दरकांड के नायक हनुमान हैं। लंकाकांड के पूर्वार्ध के नायक अंगद हैं तो उत्तरार्ध के स्वयं राम। जहां मानस के पाठ विश्लेषण में उसकी कथात्मक गुत्थियां, रचना कौशल, सौंदर्य विधान, वागर्थ - प्रपत्ति खुलती चलती है, वहीं विनयपत्रिका में ‘मध्ययुग में एक बेहतर इंसान न बन पाने की आत्मभर्त्सना’।

शनिवार, दिसंबर 17, 2011

प्रागैतिहासिक उपनिवेशीकरण की दास्तां के बहाने

           
आधुनिक सभ्यता के विकास की गाथा लिखना एक तरह से साभ्यतिक इतिहास की बर्बर कथाओं को दोहराना है। सर्वशक्तिमान सत्तामूलक सांस्कृतिक हमलों के भीतर पैठ कर उसे उकेरना है। उन अनुभवों में लौटना है जो रक्तरंजित हैं। बर्बर हिंसा और खून के छींटें से भरे हैं। लैटिन अमेरिकी लेखकों में शुमार जानेमाने लेखक और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मारियो वार्गास ल्योसा ने इस किस्म का साहस किया है। उनने एल आब्लादोर / (द स्टोरीटेलर) / (किस्सागो) नामक अपने उपन्यास में न सिर्फ सिविलाइजेशन से संबंधित बहसों को नये ढंग से जन्म दिया है बल्कि पेरू के मूल और प्राचीन रहवासी माचीग्वेंगा आदिवासियों के बहाने वैश्विक सभ्यता की समीक्षा कर दी है।
आर्यों और अनार्यों की बहसें हमारे प्राचीन इतिहास के केंद्र में काफी जगहें घेरती है। जैसे आर्यों ने यहां के मूल निवासियों को बर्बर तरीके से कुचल कर एक  एक नयी सभ्यता की नींव रखी और आदिवासियों को हाशिए पर ढकेल दिया वैसे ही पेरू में सबकुछ घटित हुआ। मूल निवासियों की भाषा, संस्कृति, जीवन शैली, गीत – संगीत, धार्मिक और आस्थामूलक मान्यताओं, पुरातन तौर – तरीकों, प्रकृति के साथ सहकार जीवन आदि को कूचल कर नयी सभ्यता विकसित की गई।
मारियो वार्गास ल्योसा इस उपन्यास के बहाने परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व, सभ्य और असभ्य की वर्चस्वकारी सत्तामूलक संस्कृति, विकास बनाम पिछङापन का ज्वलंत वैश्विक सवाल उठाते हैं। सामाजिक गैर – बराबरी का प्रश्न भी। उनके जेहन में यह सवाल जिंदा हो उठी कि संस्कृति क्या है? क्या सभ्य बनाने के लिए परंपरागत संस्कृति को नष्ट कर देना जरुरी है? बर्बर कौन है? उपवनिवेशिकरण ने हमारे अस्तित्व के वजूद को कैसे निगल लिया है? क्या पिछङापन का सवाल गुलाम बनाने की रणनीति है? क्या मनुष्य को अधिकार है कि वे अपनी जरुरतों को के लिए प्रकृति का मनमाने तरीके से दोहन करें? आदिम सभ्यताओं को नष्ट करने में मिशनरियों, भाषाविदों, नृविज्ञानियों, नृतत्त्वशास्त्रियों, बुद्धिजीवियों आदि की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही है जितनी सौदागरों और पूंजीपतियों की?
लैटिन अमेरिका ही नहीं अफ्रीका और एशियाई समाजों में भी जंगलों और प्रकृति की गोद में बसने वाले आदिवासियों को शताब्दियों से उजाङा जा रहा है। आज इसकी गति तेज हो गयी है। आधुनिक विकास, पश्चिम आधारित उत्तेजक जीवन शैली और अबाध गति से बहता विनाशाकारी चक्रवर्ती पूंजीवाद ने उनके अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। आदिम, बर्बर, असभ्य, जंगली, पिछङा कह कर इनकी आलोचना की जा रही है। भारत में उन्हें लगभग माओवादी करार दिया गया है। बंगाल, उङीसा, झारखंड, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश एवं दक्षिण के राज्यों में इनसे जंगल और जमीन का हक विकास और प्रगति के नाम पर छीना जा रहा है। तथाकथित मुख्यधारा में जोङने के छलावे के नाम पर उन्हें अपनी संस्कृति और भाषा से अलग कर देने की साजिश रची जा रही है। शिक्षा और विकास के नाम पर उन्हें अपने जैसा बनने के लिए बाध्य किया जा रहा है। दुनिया के बङे – बङे कारपोरेट घराने, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सत्ता की दलाली करने वाले अंतर्राष्ट्रीय नेताओं और सौदागरों की मिलीभगत और लूटखसोट की वजह से विकास के बहाने जंगल और भूमि अधिग्रहण को अंजाम दिया जा रहा है। यह सब बेशकीमती उपजाऊ जमीनों को हङपने, इमारती लकङियों और प्राकृतिक खनिज पदार्थों को लूटने का उपक्रम है। आज भारत में टाटा के सिंगुर से लेकर पास्को, वेदांत आदि के विवाद को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।
पिछले तीन दशकों में जब से आर्थिक उदारीकरण और मुक्त व्यापार का दौर शुरू हुआ, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी समाजों को तो लगभग नींबू की तरह निचोङ दिया गया। 80 का दशक तो अफ्रीका के इतिहास में बर्बादी के दशक के रूप में याद किया जाएगा। इसकी छवि तो ‘भूख से मरते लोगों के महाद्वीप’ के रूप में बन गयी है। व्यापारियों और कंपनियों को प्रोटेक्ट करनेवाली सरकारें (जो इस मुनाफाखोरी के हिस्सेदार है) यह सब इस दलील देकर कर रही है कि भूख और कुपोषण से मरने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा आदिवासी और  पिछङे समाजों में है। शिक्षा न्यून स्तर पर है। स्वास्थ्य और प्रति व्यक्ति आय की स्थिति दयनीय है। लैटिन अमेरिकी समाजों में बेरोजगारी के आंकङे निर्रथक हो चुके हैं। उसे तो लगभग ‘चौथी दुनिया’ में तब्दील कर दिया गया है। यह सब एक साजिश के तहत उनके द्वारा हुआ, जो आरामदेह लक्जरी कारों और जहाजों में सैर करते हैं, टेनिस और रग्बी खेलते हैं, इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, मंहगी शराब और कोक पीते, हैमबर्गर और पिज्जा खाते हुए थ्री डी स्क्रीन पर कुपोषित बच्चे और जवान आदिवासी स्त्रियों के खुले वक्षस्थल देख खिलखिलाते हैं। पेरूवासियों की नजर में आदिवासी सामाजिक विद्रूप थे।
मारियो वार्गास ल्योसा ने लैटिन अमेरिकी देश पेरु के एक आदिवासी समूह माचीग्वेंगा को प्रातिनिधिकता देकर जो सवाल उठाये हैं वे बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसा नहीं है कि आदिवासी समाज के भीतर मौजूद अंधविश्वास, टोने टोटके आदि को न्यायसंगत ही ठहराते हैं, दोषपूर्ण और विकलांग बच्चों को मार देने को जायज। लेकिन वे इस बात के पक्ष में नहीं हैं कि विकास और औद्योगिकरण के नाम पर उन्हें विस्थापित कर दिया जाए, उससे उसकी भाषा और संस्कृति छीन ली जाए। प्रकृति, पहाङ, जंगल और जमीन से उन्हें खदेङ दिया जाए। लेकिन ये सब पूरी दुनिया में हो रहा है। ल्योसा का यह उपन्यास बर्बाद हो चुके इन आदिवासी समाजों या कहें मिटने की दहलीज पर खङे लोगों के आर्त्तनाद को आवाज देने की कोशिश है। हाशिए पर खङे लोगों को सहानुभूति प्रदान करने की एक कोशिश है।
ल्योसा ने पूरा उपन्यास माचीग्वेंगा आदिवासियों के किस्सागो या कथावाचक (आब्लादोर) के माध्यम से कही है, जो लेखक की कल्पनाशीलता का जबरदस्त नमूना है। यह और बात है कि उपन्यास में शोध और अनुसंधान की महत्वपूर्ण भूमिका है। मिथक और प्रागैतिहासिकता आपस में घुले मिले हैं लेकिन 1950 के बाद के पेरू का यथार्थ ज्यादा भयावह रूप में उभरे हुए हैं। समसामयिक पूंजीवाद का विकृत चेहरा ही माचीग्वेंगा या कहें आदिवासियों की त्रासदी को ज्यादा गाढ़ा रंग देते हैं। यह उपन्यास कई स्तरों पर चलता है। लेखक खुद भी बतौर पात्र मौजूद है। वह अपने मित्र साउल सूयतास आब्लादोर से यूनिवर्सिटी में माचीग्वेंगा के अदभुत किस्से – कहानियां सुनाता है। ये कहानियां कई बार मार्केस की जादुई यथार्थ की याद दिला देते हैं। चांद - सूरज, जीवन - मरण, आस्था- विश्वास, रीति – रिवाज, प्रकृति – उत्पत्ति आदि की रहस्यात्मक – रोमांचकारी, अप्राकृतिक, अवास्तविक और अविश्वसनीय कथाओं की लयबद्ध शृंखलाएं भरी पङी है। कई बार ये कथाएं सहज और सरल लगती हैं हैं तो कई बार हॉरर क्रिएट करती चलती हैं।
पर्यावरण के साथ छेङछाङ का मुद्दा भी ल्योसा ने बहुत ही गंभीरता से उठाया है और वे कहीं भी फील नहीं होने देते की समसामयिक समस्याओं की तरफ सचेत कर रहे हैं। सबकुछ मिथकीय अंदाज में घटित होता है लेकिन प्रकृति की प्रतिक्रिया की भयावता और उसका कहर इशारे में सब कह जाता है। आदिम समाज के लोगों ने प्रकृति को उपनिवेश नहीं बनाया था। वे प्रकृति का दोहन नहीं करते थे। उसकी अनिवार्यता को समझते थे। उनमें सहजीवन का भाव था। जो लोग ऐसा करते थे उन्हें सजा दी जाती थी या जब कभी प्रकृति अपना रौद्र रूप धारण करती थी तो वे उससे सीख लेते थे और जीवन फिर संतुलन की राह पर दौङता था। लेकिन आज प्रकृति और पर्यावरण की बगैर परवाह किए उसका दोहन किया जा रहा है। उसे उपनिवेश बना लिया गया है जिससे उत्पन्न होने वाले खतरे और परिणाम बीच – बीच में कथावाचक और लेखक के संवाद में झांकता है।  
मारिया वार्गास ल्योसा का यह उपन्यास आदिवासी समाज के बहाने हाशिए के लोगों के साथ किए जाने वाले सामाजिक गैर बराबरी, शोषण, उत्पीङन के साथ – साथ भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण के संकट को उठा वर्त्तमान दौर में अपनी प्रासंगिकता एवं महत्व को सिद्ध करता है। खासकर वर्त्तमान हिन्दुस्तान में।        
पुस्तक – किस्सागो
लेखक – मारियो वार्गास ल्योसा
अनुवाद – शंपा शाह
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य – 195 रुपये

  



जातिवाद के उलझे सवाल

      कुलदीप कुमार का लेख “जात ही पूछो साधु की” (जनसता, 6 नवम्बर, 2011) कई चुनौतिपूर्ण सवालों, निष्कर्षों के अलावा बेहद भ्रामक और अतार्किक हैं। उन्होंने कई सवाल उठाये हैं जिनमें से कुछ सवाल यहां रखे जा रहे हैं। पहला, क्या नाम के साथ जातिसूचक पद इस्तेमाल से कोई जातिवादी हो जाता है? दूसरा, प्रेमचंद के लेखन या कहें लेखक की जाति और उसकी रचना के बीच कोई संबंध नहीं है। तीसरा, आजादी के बाद दलित – पिछङे नेताओं ने जाति की समस्या को सुलझाया नहीं। चौथा, जाति (वाद) के प्रश्न को सामाजिक न्याय से न जोङा जाए। पांचवा, दलित समस्या और स्वअर्जित संवेदना को वही समझते हैं इसलिए दलित नेता और बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी है कि वही इसे सुलझाएं या आक्रोश को दिशा दें।
कुलदीप कुमार द्वारा उठाये गये तमाम सवालों का यहां जबाब देना मुश्किल है लेकिन जिन अनिवार्य प्रश्नों को उन्होंने उलझा छोङा है उस पर विचार करना जरूरी है, क्योंकि आये दिन दलित – आदिवासी और पिछङी जातियां न सिर्फ उस अपमान को जीते और बर्दाशत करते हैं - जो लोकतांत्रिक और सामाजिक पद्धितियों - संस्थाओं में घटित होते हैं बल्कि उन अवसरों से भी वंचित हो जाते हैं जिन्हें वे श्रम और मेधा से हासिल कर सकते थे। दूसरे, वे आरक्षण के सवाल पर बिल्कुल खामोश हैं, जिसे सामाजिक न्याय के रूप में सामने रखा गया है। और पिछले कुछ वर्षों में हमारी सामाजिक – राजनीतिक और न्यायायिक व्यवस्था इससे टकराती रही है। कुलदीप कुमार के लिए सामाजिक न्याय का अर्थ सिर्फ ‘जाति तोङो’ से है, और जाति के आधार पर सामाजिक - राजनीतिक - आर्थिक फैसले न लेने से है। निश्चय ही यह आदर्शवादी – नैतिक सुझाव है। लेकिन उनके इस ‘आदर्शवादी – नैतिक’ सुझाव की धज्जियां उनके ही उदाहरण उङाते हैं। मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश सीएस करणन ने एस सी / एस टी आयोग को शिकायत की है कि दलित होने के कारण उनके और उन जैसे अन्य न्यायाधीश के साथ सवर्ण न्यायाधीश अपमानजनक व्यवहार करते हैं। अब कुलदीप कुमार से पूछा जा सकता है कि क्या इसका समाधान सिर्फ कानूनी होगा या सामाजिक – राजनीतिक भी? यूं तो संवैधानिक – कानूनी संस्थाओं का निर्माण भी सामाजिक - राजनीतिक फैसलों के आधार पर हुए हैं। कानूनविदों की कमी देश में तब भी कम नहीं थी लेकिन आम्बेडकर को संविधान निर्माण का जिम्मा इसलिए दिया गया था क्योंकि वे दलितों – वंचितों के साथ ज्यादा न्याय कर सकते थे, उनकी तुलना में जिसने जातिगत अपमान को न सहा हो।
फर्ज करें अपमान करने वाले उच्च जाति से संबंधित वे न्यायाधीश सर्वोच्चय न्यायालय में नियुक्ति के लिए साक्षात्कार लें रहे हों। क्या उस स्थिति में सीएस करणन या उन जैसे दलित जाति से आने वाले न्यायाधीश का चुनाव होगा? क्या साक्षात्कार निष्पक्ष तरीके से लिया जायेगा? क्या दलित जाति से आने वाले प्रत्याशियों को साक्षात्कार में अपमान किया जायेगा या नहीं? योग्यता के पैमाने जातियां बनेंगी या नहीं? ऐसी अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था में आरक्षण को सामाजिक न्याय क्यों नहीं माना जाए। क्या जाति व्यवस्था को तोङना इतना आसान है? जैसा कि कुलदीप कुमार परिभाषित कर रहे हैं अगर यह नहीं टूटा तो हमारे समाज और देश में सामाजिक न्याय आयेगा ही नहीं? हजारों वर्षों में यह नहीं टूटा, इसका यह मतलब तो नहीं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था ने दलितों – पिछ्ङों को सामाजिक न्याय के नाम पर कुछ दिया ही नहीं? या जो कुछ उन्हें मिला या सुविधाएं दी गई उसे जातिवादी कहना कहां तक उचित है? आरक्षण सामाजिक न्याय नहीं है तो भला क्या है?
दूसरी बात, जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त वे न्यायाधीश जो अपने सहयोगियों को अपमानित करते हैं - न्यायायिक फैसले में जातिवादी पूर्वाग्रह से काम नहीं चलाते होंगे इसकी क्या गारंटी है? आखिर इसकी जांच पङताल कैसे संभव होगी? क्या उन न्यायाधीशों के संदर्भ में कहा जा सकता है – ‘जाति न पूछो साधु की’? क्या यह मसला सिर्फ एस.सी. / एस.टी आयोग का है या भारतीय सामाजिक व्यवस्था के भीतर निरंतरता में जीवित जातिवादी अत्याचार और दुर्दांत दमनकारी हॉररकी की? क्या यह ट्रीटमेंट न्यायाधीश करणन या उन जैसों के आत्मसम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुंचाना नहीं है? मानवीय गरिमा और मनुष्यता के अपहरण का नहीं है? उनके समूचे सामाजिक – सांस्कृतिक – शैक्षणिक अस्तित्व को नकारना नहीं है? क्या इसे सामाजिक - राजनीतिक – कानूनी दबाब के बगैर ठीक किया जा सकता है? ऐसा नहीं है कि यह एकमात्र उदाहरण है, बल्कि पूरी भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं सामाजिक संरचना में पसरी पङी है। इतनी गंभीर और जटिल समस्यामूलक स्थिति में कुलदीप कुमार का यह सुझाव कि दलित नेताओं को अपने आक्रोश सही दिशा में लगाना हास्यास्पद और अतार्किक नहीं तो क्या हैं? हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अधिनायकवादी - वर्चस्वकारी शक्ति – समुच्चयों के द्वारा लिए लिये गये सामाजिक – आर्थिक – राजनीतिक वर्णगत / जातिगत फैसले जातिवादी और अन्यायकारी हो सकते हैं लेकिन दबे – कुचले, अपमानित और हाशिये पर फेंक दिये गये लोगों के लिए जाति के आधार पर लिये गये फैसले न्यायसंगत, मंगलकारी, अवसरौचित्यता को ठहराने वाले हो सकते हैं।
जातिसूचक संज्ञाओं के हटाने से जातिवाद समाप्त नहीं होगा। यह तर्क बहुत पुराना और बासी हो चुका है। इन तर्कों के सहारे वे कोई नई बात भी नहीं कह रहे। प्रेमचंद से लेकर लोहिया तक ने इस बारे में सुझाव दिया था। यहां तक कि लोहिया – जेपी से प्रभावित दर्जनों लेखकों – चिंतकों - पत्रकारों – समाजसेवियों ने अपने नाम के साथ जातिसूचक संज्ञाओं को हटाया। लेकिन इससे न तो जातिवाद मिटा, न ही उस आंदोलन का कोई व्यापक असर समाज पर पङा। आजादी पूर्व (और बाद में भी) यह प्रयोग दूसरे रूप में अपनाया गया। दलित और पिछङी जाति के लोगों ने सवर्ण जाति के साथ लगने वाले जातिसूचक संज्ञाओं को अपने नाम के साथ जोङ लिया। ताकि वे रोजमर्रा के जातिगत अपमान से बच सकें। लेकिन क्या इससे उनके जीवन और समाज पर फर्क क्या पङा? कंफूजन क्रिएट करना जातिवाद को तोङना नहीं है। न ही यह प्रगतिशीलता की निशानी है। उससे उस स्वाभिमान को भी हासिल नहीं किया जा सकता जो उच्च वर्ग को सुलभ है। मस्तराम कपूर ने भी इस आलेख के प्रतिउत्तर में (8 नवम्बर, 2011 जनसत्ता) चौपाल में लिखा है – ‘नाम के साथ जातिवाचक शब्द न जोङना महत्वहीन है। बल्कि सवर्णों के नाम के साथ जातिवाचक शब्द न जोङना पाखंड ही बन जाता है, क्योंकि यह समाज में सवर्णों के वर्चस्व के सच पर परदा डालने की कोशिश होता है’।
जातिप्रथा के विनाश पर पहले ही बहुत लिखा जा चुका है। कुलदीप कुमार का यह कहना कि जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठतर और हीनतर न मानना जातिवाद तोङना है। बहुत ही उचित है। लेकिन क्या यह एक सिद्धांत कथन से ज्यादा है? जब कभी भी हम जातिवाद पर बहस करते हैं ऐसी बातों को दोहराते हैं, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर यह छोटा साबित हो जाता है। गांधी, आम्बेडकर, लोहिया आदि ने कई रास्ते सुझाए हैं जिनमें अंतर्जातीय भोज, अंतर्जातीय विवाह, जमीन का उचित बंटवारा, समाज का वर्गीय आधार तय करना, जातिवार जनगणना आदि हैं। गांधी का कहना था कि उच्च जाति के लोगों को दलित बस्तियों में जाकर जीवनयापन करना चाहिए ताकि उनके दुख, दर्द, पीङा, अपमान और अभाव को अनुभूत कर सकें और सच्चे मन से उसे सुलझा सकें। यही रास्ता उन्हें संवेदनशील और करुणा संपन्न बनाता और यही जातिविनाशक रास्ता बनता। यूं तो ‘आदर्शवादी कायांतरण’ के इस सिद्धांत पर आम्बेडकर को भी संदेह था लेकिन आजादी के बाद तत्कालीन सरकार और उसकी नीतियों ने इसे आदर्शवादी सिद्धांत कथन साबित कर दिया। आंकङे और सामाजिक अनुभव बताते हैं कि जितने भी सामूहिक अंतर्जातीय भोज संपन्न कराये गए वे उच्च जातियों की तरफ से आयोजित थे और दलित उसमें शामिल थे। आदर्श स्थिति तब मानी जाती जब दलितों के द्वारा आयोजित भोज में उच्च जाति के लोग शामिल होते। या मलिन बस्ती में उनके साथ रात गुजारते। लेकिन यह व्यवहारिक स्तर पर घटित नहीं हुआ। और तो और आये दिन दिखाई – सुनाई पङता है कि स्कूलों में दलितों के द्वारा खाना बनाने पर उसे उत्पीङित किया गया या सामूहिक बहिष्कार। ऐसी तमाम तरह की सामाजिक समस्या को सुलझाने की जबाबदेही सिर्फ दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों की ही नहीं बल्कि समाज के सभी तबकों का है। चाहे वह किसी वर्ग या जाति से आता हो।
रेणु ने मैला आंचल में बहुत ही यथार्थ कथन किया है – “जात - पात नहीं मानने वालों की भी जाति होती है”। जातिसूचक संज्ञा पांडे, चतुर्वेदी, सिंह, शर्मा, अग्रवाल, गुप्ता, यादव, पटेल आदि लगायें या हटायें यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना व्यवहारिक स्तर पर जातिवादी मानसिकता, दुर्भावना आदि से काम न करना और लोहिया की तर्ज पर कहें तो दलितों के साथ ‘रोटी – बेटी’ का संबंध जोङना। कुछ अपवादों को छोङ व्यापक समाजिक दायरे में ऐसा घटित होता नहीं है। बुद्धिजीवियों के भीतर व्याप्त इस छदम को रघुवीर सहाय ने पकङ लिया था - “...बनिया बनिया रहे / बाम्हन बाम्हन और कायथ कायथ रहे / पर जब कविता लिखे तो आधुनिक / हो जाए...”। हमें और हमारे समाज को इन्हीं दुचित्तापन से बचने और बचाने की जरुरत है। अन्यथा हम जातिवाद के सवाल से लङ नहीं सकेंगें। 

भारतीयता को समृद्ध करते शोध

                
भारतीय समाज कई विदेशी हमलों से लहूलुहान हुआ। राजनीतिक और सैनिक हमलों के अलावा इसने सांस्कृतिक हमले को भी सहा। प्रतिरोध और सांस्कृतिक समन्वय का क्रम भी हमेशा चलता रहा है। उसमें मुस्लिम आक्रांताओं के हमले भी शामिल रहे हैं। लेकिन हजार वर्ष बाद अब भी भारत में मुसलमानों के आगमन और स्थायित्व को लेकर जब – तब कुछ राजनीतिक पार्टियां या ग्रूप की दृष्टि संदेहास्पद बनी रही है। क्षेत्र विशेष में तनाव, सांप्रदायिक दंगे, धार्मिक अलगाव और सामाजिक जीवन में उनसे दूरी के इतिहास भी इस बात की पुष्टि करते हैं। ऐसे राजनीतिक वक्तव्य भी सार्वजनिक जीवन में जब – तब सुनाई पङते रहते हैं कि ये विदेशी हमलावर हैं। राष्ट्रदोही हैं। हजार वर्ष पूर्व की इन घटनाओं और सच्चाईयों को इतिहास अनदेखा नहीं करता है, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब उनकी राष्ट्रीयता, मातृभक्ति और सामाजिक – धार्मिक जीवनशैली को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। उनकी ‘भारतीयता’ पर प्रश्नचिह्न लगाये जाते हैं। भिन्नता प्रदर्शित करते हुए उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक साबित करने की छलपूर्ण रणनीतिक प्रयास किये जाते हैं। उनके अवदानों को विस्मृत करने और धूंधलके में ढकेलने के लिए ढ़ोंगपूर्ण नटशैली अपनायी जाती है तथा भारतीयता को ऐसे परिभाषित किया जाता है जैसे उसकी एकरेखिय अविच्छिन्न परंपरा रही हो। उसमें कभी टूट पैदा नहीं हुई। टूट की जबाबदेही तो मुसलमानों के मथ्थे मढ़ा जाता है लेकिन उनके अवदानों, सांस्कृतिक बहुलता, बहुवचनता को हाशिए पर ढकेल दिया जाता है।
ऐसे में इन बिन्दुओं पर विचार – पुनर्विचार की जरुरत पङती रहती है। जाफ़र रज़ा की शोधात्मक पुस्तक “भारतीय साहित्य में मुसलमानों का अवदान” एक किस्म से सांस्कृतिक पहलुओं पर पुनर्विचार ही हैं। यहां इतिहासकार ताराचंद को याद करना बेहद जरुरी लगता है जिनका ‘इंफ्लूएंस ऑफ इस्लाम ऑन इंडियन कल्चर’ इतिहास ग्रंथ अब भी मील का पत्थर माना जाता है। हालांकि इस दिशा में और भी गंभीर और उल्लेखनीय काम हुए हैं। लेकिन इससे रज़ा की इस पुस्तक का मह्त्व कम नहीं हो जाता। इन्होंने यह काम अपने हाथ में तब लिया जब बाबरी ध्वंस के बाद अवाम सांप्रदायिक दंगों की चपेट में झुलस रहा था।
यह पुस्तक भारतीयता – राष्ट्रीयता की संकीर्ण सोच के खिलाफ एक सांस्कृतिक प्रतिरोध की तरह है। छह अध्यायों में विभक्त शोध ग्रंथ हिन्दुस्तान की तमाम क्लासिकल और प्रांतीय भाषाओं में मुसलमानों के उल्लेखनीय अवदानों की चर्चा करता है। भाषा और लिपि की समस्याओं एवं ऐतिहासिक चरणों व विवादों से भी रु-ब-रु होने की कोशिश करता है। लेकिन विषय की जटिलता और व्यापकता ही पुस्तक की कमजोरी बनती है। अंतत: पुस्तक सूचनाओं और नामोल्लेख का मलबा साबित होता है। विवेचन, विश्लेषण एवं ठोस आलोचनात्मक स्थितियों का सामना लेखक नहीं करता है, लेकिन बिल्कुल अभाव भी नहीं कहा जा सकता है।
जाफ़र रज़ा संकेत करते हैं कि भारतीय मुसलमान इस्लामी कानून और शरीअत के मुताबिक ही जीवन नहीं जीता है। वह मुस्लिम शासकों और आक्रांताओं का अनुयायी नहीं है। इस्लामी साम्राज्यवाद के आधार पर न तो इसे समझा जा सकता है न परिभाषित किया जा सकता है। आम भारतीय मुसलमानों के व्यक्तित्व और व्यवहार को उसके साथ जोङकर देखना असंगत है। उन्हें लगता है कि जब कभी भी उनकी उपलब्धियों की चर्चा की जाती है सूफ़ियों और शियों को अलगा दिया जाता है। सब सुन्नियों के खाते में डाल दिया जाता है। बेहतर होता कि इनके साथ वहाबियों, देवबंदियों, बरौलियों, मुक़ल्लिदों आदि समूहों की चर्चा भी की जाती। उसके भीतर – बाहर आये परिवर्त्तनों से बनने वाले मानस का उल्लेख किया जाना जरुरी है। वे मानते हैं कि भारतीय जनमानस का शिक्षा, वातावरण, संस्कार सब एक है। अशोक से लेकर अकबर तक के साम्राज्य टूटते – बनते रहे हैं इसलिए भारतीयता की कोई एक निश्चित परिभाषा नहीं गढ़ी जा सकती। “विभिन्न धार्मिक विश्वास, विभिन्न सांस्कृतिक कार्य – कलाप को मिलाकर जो वस्तु बनी है, उसको भारतीयता माननी चाहिए”।
हिन्दी – उर्दू भाषा के उदगम एवं विकास की चर्चा करते हुए कहते हैं कि भारत में मुसलमान मात्र शासक के रूप में नहीं थे। वह भारतीय जीवन में इस प्रकार रच बस गये थे कि भारतीय जीवन – पद्धति, परंपरा एवं विश्वास, रस्म रिवाज सभी में भागीदार थे। इसलिए जब आक्रमणों एवं युद्धों की धूल छंटी, तो ह्रदय में स्नेह – स्त्रोत बह निकला, जिसका प्रभाव ललित कलाओं के विभिन्न क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देता था। दिलबर बेसुवा भारतीय चौसर खेलती है। ‘मजहबे इश्क’ में ब्राह्मण तथा सिंह की कथा पंचतंत्र से उद्धृत है। ‘गुलबकावली’ में शिखंडी का जिक्र है। वे अरबी- फारसी शब्दों से निर्मित होने वाले हिन्दी व्याकरण की चर्चा ही नहीं करते बल्कि उदाहरणों से दिखाते हैं कि हिन्दू – मुस्लिम भाषा और संस्कृति मिलकर एक नया व्याकरण ही खङा कर देते हैं। शब्द संपदा को समृद्ध कर देते हैं। ध्वनियों में परिवर्त्तन उपस्थित कर देते हैं। शब्दों और विन्यासों की एक रोचक दुनिया रच देते हैं। क्या यह सांस्कृतिक समन्वय और आपसी मेलजोल के बगैर संभव था? भाषिक आधार पर तो बिल्कुल ही भेदभाव नहीं था। यह और बात है कि शुद्धता के आग्रही तो हर दौर में रहे हैं। हालांकि हिन्दी में सर्वाधिक शब्द अरबी – फारसी के हैं।
रज़ा हिन्दी, उर्दू, कश्मीरी, बलती, शीना, ब्रोशस्की, खोवार, डोगरी, नेपाली, तमिल, तेलुगू, कन्नङ, मलयालम, बंगला, उङिया, असमिया, मणिपुरी, पंजाबी, सिन्धी, हिन्दको, बलूची, सरायकी, पश्तो, कोंकणी, मराठी, गुजराती के अलावा क्लासिकी भाषाएं संस्कृत, अरबी, फारसी में मुसलमान कवियों, लेखकों आदि की महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय रचनाओं का जिक्र करते हैं। हिन्दी कवियों - संतों में हमीउद्दीन नगौरी, अब्दूल रहमान, अमीर खुसरो, कबीर, जायसी से लेकर आज के लेखक असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंजूर एहतेशाम, नासिरा शर्मा आदि का भी जिक्र करते हैं। बंगला में नजरुल को पुनर्जागरण के प्रणेता पुरुष के तौर पर याद करते हैं। उर्दू साहित्य का पूरा भंडार ही मुस्लिम कवियों से भरा है।
भारतीय भाषाओं में मुसलमान कवियों – लेखकों के अपार योगदान ने देश की न सिर्फ भौगोलिक सीमाओं को मिटा दिया है बल्कि सांस्कृतिक विविधता, एकता और बहुरंगिनियों की छटाओं से समृद्ध किया है। रज़ा की पुस्तक इन विशेषताओं के उदघाटन के अलावा आगामी शोध के लिए संदर्भ ग्रंथ के रूप में भी स्थान पाएगी।       
पुस्तक – भारतीय साहित्य में मुसलमानों का अवदान
लेखक – जाफ़र रज़ा
प्रकाशक – लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
मूल्य – 375 रुपये

    

शनिवार, अगस्त 13, 2011

जादुई यथार्थ का महानायक

      अपने जादुई यथार्थवाद से चमत्कृत करने वाले नोबेल पुरस्कार से सम्मानित विश्व प्रसिद्ध लेखक गाब्रिएल गार्सीया मार्केस हिन्दी पाठकों के लिए अनजान नहीं हैं। लेकिन हिन्दी में उनकी रचनाओं या उन पर लिखी आलोचनात्मक पुस्तकों का अभाव सा रहा है। तब जबकि दुनिया की अन्य भाषाओं में मार्केस की रचनाओं का अनुवाद एक आंदोलन की तरह प्रकाशित की जाती रही है। प्रभात रंजन ने मार्केस की रचनात्मक उपस्थिति, यायावरी जीवन संघर्ष, पत्रकारीय जीवन के साथ – साथ लगभग उनकी जीवनी का बहुलांश ही ‘मार्केस की कहानी’ में लिख दिया है।
मार्केस से संदर्भित हिन्दी में यह एक ऐसी मुक्कमल पुस्तक है, जो न सिर्फ उसके लेखन को समेटता है बल्कि उसके बचपन, शिक्षा – दीक्षा, कैरियर, पत्रकार के रूप में संघर्ष और पहचान, महान लेखक बनने के लिए देखे जाने वाले सपने और उसके भीतर चल रही सृजनात्मक कशमकश तथा संघर्ष, एक सफल लेखक का जीवन और लेखन, पसंद – नापसंद सबको दर्ज करता है। यहां तक कि उनके जीवन में औरतों की भूमिका का भी जिक्र है जो कि हिन्दी के पाठकों के लिए अलग अनुभव और दृष्टि साबित होंगी। अमूमन हिन्दी में स्त्री पात्रों पर लेखन होता रहा है लेकिन लेखक के जीवन में कितनी प्रेमिकाएं और पत्नियां आयीं स्वतंत्र लेख के रूप में जिक्र नहीं मिलता है। प्रभात रंजन ने मार्केस की लिखी आत्मकथा, उपन्यास, कहानियां, अन्य रचनाएं, साक्षात्कार के अलावा उन पर लिखी गेराल्ड मार्टिन की जीवनी – लेख आदि का भी सहारा लिया है। 
प्रभात शुरुआत में ही यह प्रश्न उठाते हैं कि उनके साहित्य की रहस्यमयी, लगभग अविश्वसनीय – सी दिखाई देने वाली इस दुनिया की कोई वास्तविकता है भी क्या या सब कुछ महज फंतासी है? फिर इस प्रश्न का पीछा करते हुए उसके वास्तविक जीवन में प्रवेश करते हैं। जहां मार्केस का बचपन रहस्य, रोमांच, जादुई कथाएं, फंतासी और ठोस सच्चाइयां है। एक तरफ हंसता – मुस्कुराता जीवन के भरपूर रंगों में सना जीवंत कोलम्बिया का अराकाटक शहर है तो दूसरी तरफ उसका उजाङ – वियावान डराबनी सूरत। एक तरफ अराकाटक का उत्कर्ष तो दूसरी तरफ उसका पतन।
एक तरफ नाना कर्नल निकोलस का हीरोइक यथार्थवादी, बहादुर और बेखौफ जीवन है तो दूसरी तरफ नानी की रहस्यमयी दुनिया। एक तरफ उसे नाना से  युद्धों, कब्जों, लङाइयों, घायलों और कब्रिस्तानों की कहानियां सुनने को मिलती है तो दूसरी तरफ नानी से भूत – प्रेत, अलौकिक किस्सों - कहानियों और मृतकों की कथाएं। प्रभात मार्केस के हवाले से लिखते हैं कि नाना – नानी की दो भिन्न संसारों की यथार्थवादी और जादुई छवियां ही उनकी ज्यादातर रचनाओं में अभिव्यक्त हुई है। तर्क और विश्वास का द्वंद्व ही उनकी रचनाओं की प्राणशक्ति है। वास्तविक और अवास्तविक का मिलन ही उपत्यका है।
‘लीफ स्टॉर्म’ और ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ में अराकाटक शहर का ही उत्थान और पतन दर्ज है। वन हंड्रेड... में मकोन्दों शहर अराकाटक की जगह आया है जो सारे लैटिन अमेरिका का रूपक बन हुआ है। प्रभात इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि दोनों रचनाओं में अराकाटक एक तरह से अभिव्यक्त नहीं हुआ है। बल्कि दोनों के अफसाने जुदा – जुदा हैं। लेकिन मार्केस ने कोलम्बिया के इस शहर को ऐसा रचा कि नामालूम सा शहर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना गया। ऐसा शायद ही देखने को मिलता है कि लेखक की वजह से शहर अपनी पहचान बनाता है।
मार्केस का बचपन अपने नाना के यहां बीता। अराकाटक में। जो कि केले के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। बहुराष्ट्रीय निगमों के कारण यहां की दुनिया रंगीन और उत्कर्ष पर थी। युनाइटेड फ्रूट कंपनी के जाने के साथ ही शहर का रौनक चला गया। नाना की जिंदादिल हीरोइक आबाद दुनिया भी। नाना के मरने के वर्षों बाद जब मां के साथ मार्केस उस हवेली को बेचने आया था तो देख कर दंग रह गया कि चमकता – दमकता यह शहर सूखे पत्ते की खङखङ में बदल चुका है। जहां जोश से भरा जीवन था वहां अब वीरानी थी। उसी उत्थान – पतन और बर्बादी के फसाने को मार्केस ने अपनी रचनाओं में दर्ज किया है। पहला उपन्यास ‘लीफ स्टॉर्म’ उसी से संबंधित है। ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ में उसी का चरम दर्ज है।
‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ मार्केस की रचनात्मकता का ही नहीं बल्कि लैटिन अमेरिकी लेखक की रचनात्मकता की श्रेष्ठ उपलब्धि है। यही उनकी ख्याति का आधार। यह तो मार्केस को भी आभास था कि यही रचना गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकालेगा। प्रभात रंजन ने मार्केस के इस उपन्यास पर स्वतंत्र लेख लिखा है। जिसमें उन्होंने लेखन की शुरुआत, कठिनाई, प्रकाशन, अनुवाद से लेकर बेस्ट सेलर होने और श्रेष्ठ विश्व प्रसिद्ध लेखक होने तक की कथा को दर्ज किया है। रचनात्मक प्रक्रिया के अलावा जादुई यथार्थवाद को समझने – समझाने और उसकी प्रविधि को भी दर्ज किया है। प्रभात लिखते हैं – इस उपन्यास ने मार्केस नामक लेखक की तस्वीर नहीं बदली उसने विश्व साहित्य का मानचित्र बदल दिया। इस उपन्यास ने इतनी बङी विभाजक रेखा खींची इससे पहले किसी गैर – यूरोपीय लेखक ने नहीं खींची थी। कार्लोस फुएंतेस ने इस उपन्यास को लैटिन अमरीका का बाइबिल बताया। ल्योसा ने लैटिन अमरीकी वीरता का महान उपन्यास।
जिन दिनों मार्केस इस रचना को लिख रहा था उन दिनों उसके पास घर  चलाने का खर्च नहीं था। प्रकाशक को पांडुलिपि भेजने के लिए उसकी पत्नी ने हेयर ड्रायर और हीटर तक बेच डाला। बाकी चीजें पहले ही बिक चुकी थी। लेकिन इसी रचना ने उन्हें समृद्ध बना दिया। प्रभात लिखते हैं इस जातीय ‘आचंलिक’ उपन्यास की ताकत इसकी जीवंतता है, लैटिन अमेरीकी जीवन जीवन का वह पहलू जिसके बारे में बाहर के लोग बहुत कम जानते थे। वे वहां की संगीत, मस्ती, जिजीविषा आदि का जिक्र करते हुए बताते हैं कि यह योरोपीय ढंग के जीवन की प्रतिकथा कहती है। आधुनिकता के सामने परास्त नहीं होती है। बल्कि बेपरवाह अपने विश्वासों और मान्यताओं से चिपकी रहती है। पश्चिमी सभ्यता के दमन और औपनिवेशिक दासता के महाआख्यान को भी रचती है। और अपनी जङों में धंसे होने की महागाथा को भी। प्रभात यहां मैला आंचल का जिक्र करना नहीं भूलते जो महान रचना होकर भी हिन्दी भाषा और अनुवाद की समस्याओं के कारण विश्वस्तरीय ख्याति से वंचित रह गयी।
प्रभात प्रतिबद्ध और संघर्षशील पत्रकार को भी दिखाते हैं और एक सफल लेखक के सफरनामा को भी। वे ‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा’ को एक बदले हुए उपन्यास के तौर पर पाकर उसकी विशेषता का उल्लेख करते हैं। यह दिखाते हैं कि सत्ता, राजनीति, जातीय कथा, स्थानीय जादुई संस्पर्श से निकल अपनी बनी छवि को तोङते हुए मार्केस प्रेम की कोमल भावनाओं, वफा, त्याग और वादा प्रेम की गलियों से अपने को गुजारते हैं।
मार्केस की रचनाएं जितनी रोमांचक हैं, जीवन भी। बेहद नाटकीय। उतार – चढ़ाव से भरा। कभी अर्श पर कभी फर्श पर। प्रभात रंजन ने बेहद सधी, सीधी और आकर्षक भाषा में सबकुछ समेटा है। कहीं – कहीं दोहराव रस भंग करता है अन्यथा इस पुस्तक को उपन्यास, कहानी, जीवनी और आलोचना के खांचे में बांटे बगैर सबका मजा पाठक उठा सकता है।           
पुस्तक – मार्केस की कहानी
लेखक – प्रभात रंजन
प्रकाशक – प्रतिलिपि बुक्स, जयपुर
मूल्य – 250 रुपये