शनिवार, जुलाई 16, 2011

बंद दरवाजों के बरक्स...

                     
जयंत नर्लिकर देश के जाने माने ‘एस्ट्रोफिजिसिस्ट’ (खगोल – भौतिकशास्त्री) हैं। विदेशों में लंबे समय समय तक सैद्धांतिक खगोलशास्त्र पढ़ाने के बाद ‘टाटा इंस्टीट्यूट आव फंडामेंटल रिसर्च’ मुम्बई में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वे एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स जैसी संस्थाओं के संस्थापक और निदेशक भी रह चुके हैं। सेवानिवृति के बाद प्रोफेसर अमर्टस के रूप में सेवा प्रदान कर रहे हैं। विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाने वाला भटनागर और युनिस्को की प्रतिष्ठित पुरस्कार कलिंगा से सम्मानित हो चुके हैं। बहुमुखी प्रत्तिभा के धनी नर्लिकर ने जहां एक शिक्षाविद, प्रोफेसर और खगोलविद के रूप में योगदान दिया है वहीं उन्होंने सायंस फिक्शन रच कर भी पाठकों के बीच अपनी पहचान बनायी है।
खगोलशास्त्र और यूनिवर्स (ब्रह्मांड) की जटिलता एवं रहस्यलोक पर कई किताबें लिख चुके नर्लिकर की नयी पुस्तक “शेक – अप इंडिया” है। यों तो इस पुस्तक में प्रकाशित लेख टाइम्स ऑफ इंडिया दैनिक में बतौर कॉलम प्रकाशित हो चुकी है। पुस्तककार रूप में यह देश की छोटी - बङी चिंताओं, समसामयिक ज्वलंत प्रश्नों से बिंधी नजर आती है। उनकी चिंता के केंद्र में 21वीं सदी का भविष्य है। जो अपने कंधे पर मूर्खताओं की गठरी लादे लिए जा रहा है। वैज्ञानिक सोच, समझ और दृष्टि से दूर यूं ही अंधेरे में सरपट दौङ रहा है। न उसे वर्त्तमान की चिंता है न बेहतर भविष्य की। अपने अतीत के प्रति भी वह मोहाविष्ट है।
आमतौर पर हम किसी ब्रह्मांड विज्ञानी से यह उम्मीद नहीं करते कि वह गंदगी और स्वास्थ्य, ऐतिहासिक धरोहरों और इमारतों की रखरखाव, क्लोन बनाती शिक्षा व्यवस्था, भाषा की समस्या, वक्त की बर्बादी जैसी समस्याओं पर सवाल उठायेगा। नर्लिकर उठाते हैं। वे अपने लेखों – ‘वी नीड अ मोडर्न माइंडसेट, इंडिया सफर्स फ्राम अ लैक ऑव प्रोफेशनलिज्म, हालिडे टू मैनी, डिक्लाइनिंग वर्क स्टैंडर्डस, द पापुलेशन ट्रैप, द नेचर ऑव ब्यूरोक्रैसी, मैनेजिंग योर टाइम, इज एस्ट्रोलॉजी अ सायंस?, नो मोर रमनस, बोसेज एंड साहाज, डिस्कवरिंग टैलेंट, करविंग ब्रेन ड्रेन, डिक्लाइन ऑव एकेडिमिया, डिक्लाइन ऑव सायंस एडुकेशन, प्रोब्लेम ऑव लैंगुवेज, द फाराडे ट्रेडिशन’ आदि - आदि में इन समस्याओं से जूझते नजर आते हैं। उन्होंने छोटी – छोटी चीजों पर ध्यान खींचा है जिसे हमारी सत्तामूलक व्यवस्था नजरअंदाज करती रहती है। एक औसत पढ़ा लिखा भारतीय भी इस पर न ध्यान देता है न ही उन समस्याओं को सुलझाने की दिशा में पहल करता है। यही कारण है कि पूरी व्यवस्था रुग्नाक्रांत दिखती है।  
नर्लिकर अपने लेखों में ऑब्जर्वर (निरीक्षक) की तरह दिखते हैं। ‘वी नीड ए माडर्न माइंडसेट’ में वे कहते हैं कि हम नेहरुवीयन मॉडल, कल्पना, सोच, दृष्टि और लक्ष्य से काफी दूर भटक गए हैं। हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियां बेमानी साबित हो रही हैं। एक तरफ हम गणेश को दूध पिला रहे हैं दूसरी तरफ गर्भपात के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। हम अपने घर की सफाई तो कर रहे हैं लेकिन सार्वजनिक स्थानों को गंदा कर रहे हैं। लोग बीमारियों से मर रहे हैं लेकिन सफाई कभी हमारा अभियान नहीं बना। वे ब्राजील के हवाले से कहते हैं कि वहां सार्वजनिक जगहों एवं दूकानों के आसपास सफाई की जबाबदेही व्यवस्था के अलावा नागरिक भी उठाते हैं। वे सिंगापुर के कङे कानून का जिक्र करते हैं लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि यहां सफाई के लिए कानून बनाना भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा देना है। बाल मजदूरी और दहेज प्रथा के जिंदा चले आने पर भी प्रश्न करते हैं। नर्लिकर इन समस्याओं से निपटने के लिए जागरुकता फैलाने और लोगों के आचरण सुधारने पर बल देते नजर आते हैं।
नर्लिकर आधुनिक माइंडसेट की जरुरत महसूस करते हैं। वे अंग्रेजी ढंग की स्कूली शिक्षा पद्धति पर भी सवाल उठाते हैं और पश्चिमी जीवन शैली पर भी। वे उसका अंधानुकरण करने की वकालत नहीं करते हैं। वहां के गिरते मानवीय मूल्यों से सचेत करते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब वे विकास के प्रतिमान पश्चिम से उठाते हैं लेकिन उस जीवनशैली से असहमत हो जाते हैं। ‘इंडिया सफर्स फ्रॉम ए लैक ऑव प्रोफेशनल्जिम’ में वे रक्तरंजित युद्धों के इतिहास के हवाले से कहते हैं कि भारत लगातार इसलिए पराजित होता रहा क्योंकि प्रोफेशनलिज्म का अभाव रहा है। वे आज भारत की असफलता का कारण प्रोफेशनलिज्म का अभाव मानते हैं। नर्लिकर के इस निष्कर्ष को एक किस्म से सरलीकरण ही कहा जाएगा। वे सफलता को पेशेवर क्रियात्मकता से जोङते हैं। आखिर पेशेवर पश्चिमी समाज ने आपसी संबंधों में दरारें भी पैदा की है।
‘होलिडे टू मैनी’ में वे सवाल उठाते हैं कि आखिर एक सेकुलर स्टेट में धार्मिक आधार पर इतनी छूट्टियां क्यों दी जाती है? उसमें राज्यों की भागीदारी और भूमिका क्यों शामिल होती है? दिन – प्रति – दिन बढ़ती छूट्टियां उन्हें बैचैन करती है। इसके लिए वे नेताओं को दोषी मानते हैं। वे कहते हैं 16 में से 13 छूट्टियां धार्मिक आधार पर दी जाती है यह मेरे लिए रहस्य का विषय है। नर्लिकर काम को ही प्राथमिकता देने वाले लोगों में हैं। वे भारतीय ब्यूरोक्रेसी में सेंस ऑव ह्यूमर की कमी का भी जिक्र करते हैं। उनका मानना है कि नौकरशाही को समझना बेहद जटिल काम है। व्यंगात्मक अंदाज में कहते हैं - यहां नौकरशाहों में विवादों से बचने, अपने को सुरक्षित रखने और सावधानी बरतने के गुण पाए जाते हैं। वे वैज्ञानिक शोध करने वाले के बराबर वेतनमान दिए जाने की असंगति की तरफ भी ध्यान खींचते हैं।
सांस्थानिक तामझाम और रिचुअल में समय की बर्बादी को ‘मैनेजिंग योर टाइम’ में दिखाते हैं। सेमिनार, भाषण, मीटिंग, कार्यशाला आदि के पहले और बाद में जो औपचारिक अनुष्ठान किए जाते हैं वे सख्त खिलाफ हैं। वे टीवी को इसलिए कोसते हैं कि वह एयरपोर्ट पर नेताओं के आने के स्वागत में खङे दिखाते रहते हैं। जन्मदिन और शोकसभाओं को कवर करते हैं। बेहतर होता वे रचनात्मक चीजों को दिखाते।
भारतीय शिक्षण संस्थान, उसकी नीतियां और उच्च शोध की संभावना तथा गुणवता हमेशा से ही विवाद के विषय रहे हैं। क्या भारत में प्रतिभा की कमी है या सरकारी स्तर पर नीतियों में कमी? क्लोन बनाने वाली और गलाकाट प्रतिस्पर्धी रोजगारोन्मुख शिक्षा पर उन्होंने कई दनदनाते सवाल खङा किए हैं। आगे रमन, बोस और साहा जैसे वैज्ञानिक नहीं पैदा होने के कारणों की छानबीन की है। अकादमिक जगत की गिरती साख को पहचानने की कोशिश की गई है। समांतर रूप से कोचिंग क्लास फलने – फूलने पर चिंता व्यक्त की गई है। भारत में वैज्ञानिक विकास और विज्ञान की स्थितियों की पङताल की गई है। नर्लिकर ने अपनी इस पुस्तक में समसामयिक ज्वलंत प्रश्नों की झङी लगा दी है। कुल मिलाकर देखें तो इस पुस्तक में उभरते भारत की विविध समस्यामूलकता और उससे बाहर निकलने की दृष्टि एवं सोच शामिल है। लेकिन गहराई का वह आयाम गायब है जो ऐसी चिंतन एवं दृष्टि के लिए जरुरी होते हैं।    

पुस्तक – शेक – अप इंडिया (अंग्रेजी)
लेखक – जयंत नर्लिकर
प्रकाशक – ग्लोबल विजन प्रेस,  दिल्ली 
मूल्य 245 रुपये



शनिवार, जून 04, 2011

प्रेम की सैद्धांतिकी

वरिष्ठ कवि – कथाकार – आलोचक रमेशचंद्र शाह का सातवां उपन्यास “असबाब-ए-वीरानी” संभवत: हिन्दी में इस मायने में अनूठा और अकेला उपन्यास होगा कि यह प्रेम को सुनियोजित - प्रायोजित रूप में प्रस्तुत करता है। यह प्रायोजित प्रेम पति के कहने या उकसावे पर घटित होता है। और आश्चर्य ! उसकी युवा पत्नी रिटायर्मेंट की दहलीज पर खङे पति के वरिष्ठ सहयोगी - सहकर्मी – गुरु से प्रेम करती है। वह इस बात की पूरी जानकारी अपने पति को देती है कि वह उसके सहयोगी से प्रेम करती है। हैरान करने वाली बात यह है कि तात्कालिक रूप से उसके पति को आश्चर्य और खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। बाद में नाटकीय रूप से चीजें बदल जाती हैं। संबंधों में तनाव उसी तरह पैठ बनाते हैं जैसे बारिश के थपेङे दीवारों के भीतरी हिस्सों में सीलन पैदा करते हैं।
इससे पहले की कथा की अंतर्वस्तु में प्रवेश किया जाए “असबाब-ए-वीरानी” की टेक्नीक पर गौर किया जाए। शाह जी ने एकदम से विशिष्ट शैली अख्तियार की है। यह उपन्यास तीन भिन्न लेखकों का उपक्रम है। द्विवेदी जी के उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ की शैली का रूप यहां देखा जा सकता है। बाणभट्ट... में लेखन के लिए मिस कैथरीन ‘रॉ मैटेरियल’(अधूरा दस्तावेज) उपलब्ध कराती है। ‘असबाब-ए-वीरानी’ में प्रेम का अधूरा दस्तावेज (जिसे ठीक – ठीक अधूरा कहना भी मुश्किल है) एक डायरी की शक्ल में एक चिट्टी के साथ अनामगिरि नामक व्यक्ति छोङ जाता है। दारूका वन के डाकबंगले में। उसे मालूम है कि एक लेखक यहां एकांत में लेखन के लिए आता है। अनामगिरि उस लेखक के लेखन से भली - भांति परिचित है जिसका हवाला भी चिट्टी में देता है। साथ ही उससे उम्मीद करता है कि मेरे इस अधूरे ‘आपबीती’ दस्तावेज को लिख दें क्योंकि लेखन में मेरे हाथ तंग हैं।
अनामगिरि लेखक को यह छूट देता है कि मेरी आपबीती को आप अपने ढंग से लिखें ‘परंतु...वह लेखक ही क्या, जिसे किसी और की आपबीती भी अपनी ही आपबीती सरीखी न लगे’। लेखक को यह लगता है कि इस कथात्मक डायरी से मिलती – जुलती कथा दिल्ली – उदयपुर यात्रा के दौरान ट्रेन में एक सहयात्री ने भी सुनायी थी। बहरहाल संक्षेप में कथा के तीन प्रतिनिधि नैरेटर हैं। अनामगिरि जिसका प्रतिनिधित्व लेखक करता है और इस लेखक का प्रतिनिधित्व रमेशचंद्र शाह करते हैं।
रमेशचंद्र शाह के लेखक के अनुसार अनामगिरि फॉरेस्ट विभाग का उच्च अधिकारी है। अपने काम के प्रति ईमानदार और सिनसियर। वह कभी लाभ – लोभ में न पङा। सत्ता – प्रतिष्ठान, रुतबे और ओहदे से हमेशा अप्रभावित रहा। जुनियर अधिकारियों की मदद करना, आगे बढ़ाना और प्रोत्साहित करने को अपने धर्म की तरह लिया। नीतीश जो बेहद प्रतिभाशाली – परिश्रमी कनिष्ठ अधिकारी है उसे तराशने और आगे बढ़ाने में हमेशा मदद की। वह इस बात पर गर्व करता है कि नीतीश उससे ज्यादा प्रतिभाशाली तथा मौलिक है और उसके काम को आगे बढ़ायेगा।
साहित्यिक मिजाज के अनामगिरि का संबंध नीतीश से बेहद नजदीकी है। दोनों में एक – दूसरे के प्रति सम्मान का भाव है। नीतीश की पत्नी अनु भी अंग्रेजी साहित्य की छात्रा रह चुकी है। इसलिए संबंध में प्रगाढ़ता बढ़ने लगती है। अनामगिरि उपन्यास पसंद पाठक हैं, अनु की रूचि कविता में है। दोनों में साहित्यिक टकराव होता रहता है। इनकी आपसी बहस में जब – तब नीतीश शामिल होता है लेकिन ये दोनों उसे इस बहस से बाहर ही रखते हैं। साहित्यिक बहसें दोनों में भीतरी बदलाव लाता है। अनामगिरि का रुझान कविता के प्रति और अनु का उपन्यास के प्रति होता है।
रमेशचंद्र शाह उपन्यास में जिसे साहित्यिक बदलाव के रूप में दिखलाते हैं यह प्रेम के उभर आने का एक सांकेतिक रूप है। जंगल में सैर करते – भटकते हुए दोनों साहित्यिक चर्चा में मशगूल होते हैं। एक दिन अचानक डाकबंगले में लौटकर दोनों के बीच की भौतिक सारी दूरियां टूट जाती है। शाह का लेखक लिखता है –“मैंने ही उसे खींच लिया अपनी बांहों में? कि वही खुद मुझसे आ चिपटी?...उसने पहले मेरी आंखों को चूमा कि मैंने पहले उसकी आंखों को? पहले मेरे होंठ उसके होंठों से जा लगे कि उसके?...कुछ भी तो भान नहीं मुझे। जाने कित्ती देर तक हम चूमते और चूसते रहे एक दूसरे को...मुझे तो ऐसा ही याद पङता है कि उसी ने वह सब किया था...मैं तो अपनी सुध – बुध ही गंवा बैठा था...”।
लेखक ने इसके बाद उपन्यास में बेहद नाटकीय ढंग से कथा बदल दी। इस शारीरिक प्रेम ने अनामगिरि को धिक्कारा। आत्मालोचन को बाध्य किया। लेकिन अनु ने सब सहज कर दिया। उसने पति को यह घटना बता दी। नीतीश इस बात के लिए अनामगिरि की सराहना करता है कि वह अनु के अंदर स्त्रीत्व को जगाया जो अब तक सुप्त थी। नीतीश ने कभी उसे महसूस नहीं किया था। दोनों के संबंधों ने उसे जगा दिया। वह कहता है ‘प्रेम किसी की मिल्कियत नहीं। हमें खुलकर अपनी भावनाओं को, अपनी इच्छाओं और आवेगों को जीना चाहिए। इसमें कैसा परदा और क्यों? मेरा ब्याह हुआ है इससे - क्या महज इसलिए मालिक बन गया मैं – इसकी भावनाओं का भी’?
बाबजूद इसके अनामगिरि इस घटना के बाद अपने परिवार और नौकरी में लौट आता है। लेकिन दोनों के बीच फोनालाप शुरू हो जाता है और प्रेम की उत्कंठा, बेबसी, भावप्रवणता, रिक्ति, एकालाप और संवादों का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है। यहां रमेशचंद्र शाह ने अंतर्मन की ध्वनियों की व्याप्ति और सामाजिक संबंधों की सीमाओं को महीन धागे में पिरो दिया है।
इस क्रम में रमेशचंद्र शाह इस प्रेम की सभ्यता समीक्षा भी प्रस्तुत करते हैं। यह प्रेम पाप – पुण्य की श्रेणी से बाहर निकल आता है। सामाजिक – पारिवारिक नैतिकता – अनैतिकता की कैटेगरी से भी। सिर्फ चाहत की उज्ज्वल लकीरें फैली है। लेकिन यही प्रेम पुरुष की उस दोहरी मानसिकता को भी खोल देती है जो इन संबंधों में फैली है। अनामगिरि अपने प्रेम को अपनी पत्नी से छुपाता है। नीतीश जो हर वक्त अपनी पत्नी को पारिवारिक – सामाजिक दबाबों से प्रोटेक्ट करता था उसकी रुचियों का ख्याल रखता था, अनु - अनामगिरि के साथ को बढ़ावा देता था, साथ घुमने और अपनी भावनाओं को उसके साथ बांट लेने को कहता था अचानक बदल जाता है। वह दोनों के प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। उसकी सैद्धांतिक बातें खोखली साबित होने लगती है। वह उस प्रेम पर पहरा बिठा देता है। एक प्रेम जो उर्ध्वमुखी रास्ते पर दौङना चाहती थी अधोमुखी गिरती है।
क्या यह उपन्यास प्रेम की त्रासदी है या दाम्पत्य संबंधों की? या प्रेम और भ्रांति के बीच फैला वितान? या प्रेम पर लिखा आलोचनात्मक भाष्य? या स्त्री – पुरुष संबंधों के खुलापन पर एक टिप्पणी? या अंत:करण की पुनर्परीक्षा? या सेल्फ कंफेशन की त्रासदी? शाह का लेखक न सिर्फ इस पर सैद्धांतिक बहस को आगे बढ़ाता है बल्कि आध्यात्म और दर्शन की उस कठिन राह को पकङ लेता है जो पाठक को दुर्गम गलियों में ले जाता है और जीवन की गुत्थियां सुलझाने लगता है।      
पुस्तक - असबाब-ए-वीरानी
लेखक – रमेशचंद्र शाह
प्रकाशक – वाणी प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य – 250 रुपये


स्त्री विमर्श के नए तेवर

बींसवी सदी के उत्तरार्द्ध में पश्चिमी अकादमिक जगत में स्त्री चिंतन की व्यवस्थित और बङी दुनिया खुलकर सामने आयी। इसका असर भारतीय उपमहाद्वीप पर भी पङा। स्त्रियों से संबंधित तमाम मसले चाहे वह लिंग संवेदना, स्त्री यौनिकता, देह विमर्श, स्त्री मन, लेस्बियनिज्म हो या उनकी कार्य – कुशलता / योग्यता की समानता, समान मजदूरी आदि - आदि पर गंभीर विचार – विमर्श हुए हैं। प्रमीला के.पी. ने अपनी आलोचनात्मक पुस्तक “स्त्री : यौनिकता बनाम आध्यात्मिकता” में स्त्रियों से संबंधित इन सैद्धांतिक मसलों पर बहस की ही है उसे व्यावहारिक एवं साहित्यिक रूप भी देने की कोशिश की है।
प्रमीला अपनी दृष्टि में कोई झोल झाल नहीं रखती। बहुत ही स्पष्टता से स्त्री – पुरुष समानता की सैद्धांतिक बहस जो पश्चिमी दुनिया से चलकर अन्य भूभाग तक फैली को खारिज कर देती हैं। ‘समानता’ की इस आदर्श स्थिति की जगह वह ‘लिंग संवेदना’ को महत्व देती हैं। स्त्री – पुरुष पूरकीय स्थिति की। उनका मानना है कि न सिर्फ जैविक रूप से स्त्री – पुरुष असमानता है बल्कि सांस्कृतिक – सामाजिक – राजनीतिक स्तर पर भी है। दोनों को कसने की कसौटी भी अलग – अलग हो सकती है। इसलिए पितृसत्तात्मक समाज में समान अवसर उपलब्ध कराना वक्त की जरूरत है।
मध्यकालीन समाज में फैली स्त्री – पुरुष असमानता और स्त्री प्रतिमान भी औपनिवेशिक काल और उसके उत्तरार्द्धमें परिवर्त्तित रूप में जिंदा रही। औपनिवेशिक भारत में स्त्रियों के प्रतिमान लगभग विक्टोरियन या ओरियंटल – प्राच्यवादी ही प्रतिष्ठित हुए। राष्ट्र्वादी दौर में भी स्त्री - प्रतिमान मर्दों ने अपने अनुकूलन के हिसाब से गढ़ी। ग्रामीण और शहरी स्त्रियों की अलग – अलग स्टीरियोटाइप छवि बनाई। उसी के अंदर बंधकर जीने को विवश किया। पढ़ी – लिखी और आर्थिक रूप से संपन्न स्त्रियां भी पितृसत्तात्मक जकङबंदी से मुक्त नहीं हो पायी। उत्तर – औपनिवेशिक दौर में जब स्त्री विमर्श पर बहसें शुरू हुई लिंगगत समानता की बहसें सामने आयी लेकिन उनके स्त्रीत्व को महत्व नहीं दिया गया। अत: आज समस्त क्षेत्रों में लिंग स्तर की पुनर्व्याख्या, स्त्रीत्व का सम्मान और लिंग संवेदना का प्रसार जरूरी है। प्रमिला स्थापित करती हैं कि स्त्रीपक्षीय मान्यताओं की स्वीकृति से ही स्त्री सशक्तीकरण संभव है। प्रमीला अर्ज करती हैं कि जैसे “स्त्रियां पैदा नहीं होती बनायी जाती है वैसे ही पुरुष भी बनाए जाते हैं”। वह ‘पुरुष विनिर्माण’ की सख्त आलोचना करती हैं। आज के समय की जरूरत ऐसी बनायी जाने सामाजिक व सत्तागत संरचना को तोङना है, ताकि लिंग संवेदना पैदा की जा सके।
प्रमीला स्त्री विमर्श की बहुस्तरीयता को स्वीकारती हैं। उसी रूप में स्वीकार करने पर बल देती हैं। स्त्रीत्व की परंपरागत परिभाषा के अनुसार ‘पतिव्रता’ का भी खंडन करती हैं और वर्किंग बोल्ड वूमेन मतलब ‘पुरुष की तरह समान व्यवहार’ करने वाली का भी। घरेलू महिलाओं की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण मानते हुए दुनिया के विकास में उसके योगदान की सराहना करती हैं। देहवादी विमर्श का खिलाफत न करते हुए मानसिक व संवेदनात्मक पहलू को जोङने की बात करती हैं। होमोसेक्सुअलिटी को प्रकृति विरूद्ध साबित करने एवं उन्हें पहचान विहीन “अन्य” कर देने की साजिश का भी विरोध करती हैं। समलिंगी, वेश्या, पुरुष वेश्या, हिजङा आदि के प्रति सत्ता व समाज की उपेक्षा और असंवेदनात्मक स्थितियों का खंडन करते हुए मांग करती हैं कि वे मानसिक व संवेदनात्मक सुरक्षा के हकदार हैं। लिखती हैं - ‘सामाजिक समवाय में इनका जीवन भी महत्वपूर्ण है’।
पहले प्रकाशित अन्य शोध ग्रंथ व पुस्तकें भी इस बात को रेखांकित करती रही है कि पितृसत्तात्मक समाज हमेशा से स्त्री सेक्सुअलिटी / यौनिकता से खतरा महसूस करती रही है इसलिए उसे हमेशा नियंत्रित करने का प्रयास करती रही है। स्त्री देह को शैतानी चीज साबित करने की कोशिश की जाती रही है। स्त्रियों की यौनिकता को ‘अश्लील’ / पाप बताया गया जबकि पुरुषों को उसके पुरुषार्थ से जोङ दिया गया। स्त्रियों के देह दमन को कुलशीलता से नत्थी किया गया जबकि पुरुषों को ऋषिसत्व से नवाजा गया। पुरुषस्वत्व संपूर्ण है जबकि स्त्रीस्वत्व पुरुष के बगैर अधूरी। स्त्रियों को अशुद्ध साबित किया गया जबकि पुरुषों को मोक्ष का अधिकारी। यह अशुद्धता स्त्रियों को आध्यात्मिक स्वतंत्रता से वंचित रखने की कोशिश थी। प्रमीला देह की अभिव्यक्ति और यौनिकता को मानव की मूलभूत जरूरत मानती हैं।  
प्रमीला स्त्री – पुरुष यौनिक संबंधों में सहज आनंद की अवस्था को आध्यात्मिक मानती हैं। यह तभी संभव है जबकि दोनों के बीच सहज समभाव संबंध बनते हैं। देह के साथ आत्मा का भी स्पन्दन शामिल होता है। दोनों की अनुभूतियां समान होती हैं। जब से देहकार्य या काम के अर्थ सिमटे हैं प्रेम के अर्थ पलट गए हैं। जहां यौनिकता आक्रमकता रुख अपनाती है, युग्मों के लिए खतरनाक होती है। वे आध्यात्मिकता की तरह ही यौनिकता को व्यक्ति की निजी रुची और स्वचयन मानती हैं।
दिनकर की ‘उर्वशी’ में देह – विमर्श के पुनर्पाठ को खोलती हुई स्थापना देती हैं कि उर्वशी परंपरा विरोधी है। वह देह को शक्ति मानने वाली है। यौनिकता की अपनी परिभाषा गढ़ने वाली है। पुंसत्व की विनिर्मिति को नकारने वाली है। वह स्त्री की भावशुद्धि, यौनशुद्धि, क्षमा, सहनशीलता आदि मान्यताओं को ध्वस्त करने वाली है। प्रशिक्षित व विनिर्मित यौनिकता की विरोधी है।
प्रमीला ‘लेस्बियन नेशन’ को स्वनियंत्रित राष्ट्र मानते हुए भारत जैसे राष्ट्र में इसकी अनुपयोगिता को दर्शाती हैं। हालांकि वे उसके प्रति पूर्ण सहानुभूति से विचार करती हैं और पाठकों से भी ऐसी उम्मीद जताती हैं। स्त्री समलिंगियों पर हिन्दी में कम लिखा गया है। प्रमिला इस कमी को पूरा करती हैं। वे यौन अधिकार को मानव अधिकार से जोङकर देखने की हिमायती हैं। वे हिन्दी सिनेमा में उभरे सौंदर्य और यौन विनिर्मिति की भी सख्ती से आलोचना करती हैं। स्त्रियों को पण्य बना देने और शारीरिक आनंद को उभार देने की कोशिश की चीरफाङ भी करती हैं। प्रमीला की यह पुस्तक स्त्री विमर्श पर सुचिंतित बहस को आगे बढ़ाने में मददगार होंगी, इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं है।
पुस्तक – स्त्री : यौनिकता बनाम आध्यात्मिकता
लेखक – प्रमीला के.पी.
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन , दिल्ली
मूल्य – 200 रुपये



शनिवार, मई 14, 2011

जीवित सपनों का ठूंठ हो जाना

 
प्रभात रंजन की आठ कहानियों का नया संग्रह ‘बोलेरो क्लास’ आया है। यूं तो ज्यादातर कहानियां पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। बाबजूद इसके इन कहानियों को पुस्तकाकार रूप में पढ़ना इसलिए अलग है क्योंकि ज्यादातर कहानियां छोटे – छोटे शहरों मसलन मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी से होते नेपाल के बार्डर एवं उन्हीं इलाकों के कस्बाई एवं ग्रामीण जीवन के संदर्भों का कोलाज बनाते हुए आगे बढ़ती है। ये कहानियां ठेठ स्थानीय संदर्भों से जुङकर भी व्यापक दायरे को समेटती है। यह जितनी उत्तरी बिहार के लोकल यथार्थ को परद दर परत उघाङती, उतना ही बिहार के अन्य भागों पर भी लागू होती है। स्थान और परिवेश के बदलाव कहानियों के स्वरूप को न तो बिगाङते हैं न ही आस्वाद की प्रक्रिया को भंग करते हैं। बदलाव की यह प्रक्रिया चौतरफा देखी जा सकती है। ये कहानियां विकास की नयी पेंचदार, जटिल और बिडम्बनात्मक असाधारण स्थितियों का बयान करती हैं। नवयुवकों के आगे बढ़ने की महत्वकांक्षा, उसके ऊंचे – ऊंचे सपने, आसमां की बुलन्दियों में उङने की लालसा, वक्त के साथ कदमताल करने की कोशिश, आर्थिक समृद्धि के प्रति ललक, झलक मारती है। लेकिन अवसरों का बंद दरवाजा, बेरोजगारी, श्रमहीनता के साथ आगे बढ़ने की कोशिश उन्हें अंधी अपराधिक सुरंगों में धकेल देती है।
निश्चित स्थान और परिवेश के बुनाबट के भीतर ये कहानियां अपने समय के गंभीर सवालों से बिंधी है। वैश्विक आर्थिक – सांस्कृतिक चिंताएं, मल्टीनेशनल कंपनियों की साम्राज्यवादी नीतियां, चमकता – दमकता पसरता बाजार और लालच की दुनिया, सामाजिक – राजनीतिक रुतबे के साथ – साथ अमीरी के घोङे पर सवारी, तस्करी और अपराध के सहारे जैसे – तैसे सफल हो जाने की प्रवृति और धूरीहीन लोकल राजनीति की बिडम्बनाओं एवं विद्रूपताओं से नत्थी ये कहानियां वक्त के उजले दीवार पर कालिख पोतती चलती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो  पिछले पंद्रह – बीस वर्षों की तेज आर्थिक – राजनीतिक – सामाजिक बदलाव ही कथा में रूपकों बनकर आए हैं। यह बदलाव जितना आंतरिक स्तर पर घटित हुआ है उतना ही वैश्विक स्तर पर। बदलाव के दोनों रूप एकाकार होकर हिंदुस्तानी गांवों और समाजों को जिस कदर बदल रहे हैं, उसकी रूपात्मक - कथात्मक अभिव्यक्ति ‘बोलोरो क्लास’ में पढ़ी जा सकती है।
 ‘इंटरनेट, सोनाली और सुबिमल मास्टर की कहानी’ आंशिक एकतरफा प्रेमकथा का अहसास कराती हुई फरेब की बङी दुनिया की कथा कहती है। सुबिमल मास्टर अपने अंदर पटकथा लेखक का सपना पाले टीवी की दुनिया में शामिल होने निकल जाता है। लेकिन उसी सोनाली के द्वारा छला जाता है जिसके सपने देखता है। जिसपर उसे भरोसा है। जिसके सहारे अपनी सफलता और प्रतिभा के झंडे गांङने के ख्बाब देख रहा था। सफलता के बाजार में मानवीय संबंध, भरोसा और प्रेम सब बेमानी हो गए हैं। तकनीक और भोलेपन का संबंधवैचित्र्य सुबिमल को अपराधी ठहरा देता है। सोनाली छल और फरेब के सहारे सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंच जाती है। यह कथा कस्बाई सपने का महानगरीय चकाचौंध में समाप्ति की बारीक ट्रैजिक आख्यान को सामने रखती है।
प्रभात रंजन ने अपनी कथा टेक्नीक में आउटसाइडर और इनसाइडर दोनों ही नैरेटर का इस्तेमाल बखूबी किया है। यही वजह है कि वे आख्यान को मनमाफिक रूप में खींचते चलते हैं। अवांतर प्रसंगों से मूल कथा के मांस - मज्जा को तैयार करते हैं। ऐसा करते हुए वे बहकते या भटकते नहीं हैं बल्कि मूलकथा में ताकत भरने की कोशिश करते हैं। वे उपकथाओं की शृंखलाएं बनाते हैं। जहां कहीं भी कथावाचक का आभाव दिखता है वहां लेखक बार – बार यह बताने की कोशिश करता है कि ऐसा लोगों का मानना है, फलाने के मुंह से सुनी गई है, अफवाहों से पता चला है, लोक किवदंति है, अखबार या टीवी ने ऐसा बताया है। कथा कहने कि यह नैरेटिंग टेक्नीक न सिर्फ आकर्षक, प्रभावशाली बन पङी है बल्कि बेहद विश्वसनीय और कस्बाई कथा के उपयुक्त भी। प्रभात कथा को आमतौर पर सपाट दौङाते हैं। वे नाटकीयता के बजाए जंपिंग में ज्यादा भरोसा करते हैं। वे जरुरी होने पर एक प्रसंग से दूसरे पर जंप करते हैं।
     ‘फ्रांसीसी रेड वाइन’ भी चंद्रचूङ के बिखरते सपने के आख्यान का बयान करती है। उपहार में मिले वाइन की महिमा को प्रभात ने तरह – तरह से कथा में इस हद तक उभारा है कि वह स्टैटस सिंबल के अलावा सभी परेशानियों से मुक्ति का हल बन जाता है। चंद्रचूङ यह मानने लगते हैं कि छोटे शहर में इस रेड वाइन के सहारे नेता, अफसर, मंत्री, गुंडे सभी को साधा जा सकता है। भविष्य निर्मात्री यह वाइन उसी को भेंट दिया जाए जिनसे काम साधा जा सके। स्टैटस हासिल किया जा सके। सुरक्षा भी। लेकिन अंतत: वह पत्नी से टूट कर बिखर जाता है और उसके सपने बिखर जाते हैं। इस कथा में वाइन के बहाने सामाजिक मानसिकता, दफ्तरी नौकरशाही लोकतंत्र और असुरक्षित साधारण नागरिक की कथा को सामने रखा गया है।
प्रभात ने बहुत ही साधारण और वास्तविक पात्रों के माध्यम से अपनी कहानी को कहने की कोशिश की है। ‘फाव की जमीन’ भूमाफिया के बढ़ते आतंक को मेटाफर बनाकर प्रस्तुत करता है। मल्टीनेशनल कंपनियों के हितों को साधती विकास की भूखी सरकारें, राजनीतिक अखाङे के पहलवान और लोकल रंगदारों की नजर किस हद तक बेशकीमती जमीनों के अधिग्रहण एवं कब्जे पर है, इसका नजारा यहां देखा जा सकता है। यह जमीन जो चितरंजन बाबू का सपना था, सरकार औने – पौने दामों में अधिग्रहित कर लेती है। और लोगों के लिए छोङ देती है तो महज दंतकथाएं। फाव की जमीन फाव में चली गई।
     ‘अथ कथा ढेलमरवा गोसाईं’ भगत जी के जीवन संघर्षों और विक्षिप्तताओं के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे प्राकृतिक संसाधनों की लूट – खसोट और तस्करी के रूपक को सामने लाता है। लोक जीवन में आयुर्वेदिक चिकित्सा मुफ्त सेवा थी जिसे बङी – बङी कंपनियों ने हथियाकर बाजार और उसके माध्यम से धन उगाही का जरिया बना लिया। प्रभात अपनी इस कहानी से एक ऐसे महाआख्यान को रचते नजर आते हैं जिसमें साधारण हुनरमंद व्यक्ति बङी सत्ताओं और बाजार के खिलाङियों के आगे दम तोङता नजर आ रहा है। इंदर सत्याग्रही भी राजनीतिक लुच्चई और बङबोले मीडिया का गंभीर शिकार बनता है। आज बोलोरो क्लास समाज की मानसिकता है। यह ऐसी अभेद संरचना बनती गई है जिसमें नैतिकता, ईमानदारी, श्रम और आदर्श के लिए कोई जगह नहीं बची है। बोलेरो क्लास षडयंत्र, अपराध, देह व्यापार और राजनीतिक रंगदारी के कुचक्र से गुथा है। जो लगभग आबोहवा बनती जा रही है।    
प्रेम और कैरियर के महीन धागों से बुना आख्यान ‘एक प्रेम कहानी का अनुवाद’ है। प्रेम असली संघर्ष का रूप तब लेता है जब जातिगत विषमताएं और मनचाही कैरियर की फिसलन भरी सङकें सामने आ जाती है। एकतरफ कथानायक का कैरियर में असफलता तो दूसरी तरफ नायिका का प्राइवेट कंपनी में तनावपूर्ण अनुवाद प्रोजेक्ट और उस बीच परिवार का दबाब प्रेम के स्वर को उल्लास में बदलने के बजाए निराशा के रास्ते ढकेलता रहता है। इन्हीं निराशाओं और आशंकाओं के बीच यह प्रेम झुलता रहता है।   
प्रभात कस्बाई जीवन के देखे चरित्र, जीवन शैली, मुहावरे, भाषा और लोक फंतासी के सहारे ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं। भाषा में सहजता, रवानगी, साफगोई निश्चित रूप से आकर्षित करते हैं। पठन के लिहाज से भाषा कभी पाठकों के बीच बाधक नहीं बनती है।
पुस्तक – बोलेरो क्लास
लेखक – प्रभात रंजन
प्रकाशक – प्रतिलिपि बुक्स, जयपुर
मूल्य – एक सौ पचास रुपये


शुक्रवार, मई 06, 2011

बहुआयामी अनुभूति के रंग

                       
 पिछला एक दशक हिन्दी कविता के लिए अप्रत्याशित रूप से निराश करने वाला रहा है। अनुभव का एकहरापन, घिसी – पिटी संवेदना, कल्पना और शिल्प में ठहराव ने इसके पांव रोक रखे हैं। यह अपनी पूर्ववर्ती कविता की नकल से ही ऊर्जा खिंचने की कोशिश करती रही है। यही वजह है कि हमेशा मुख्यधारा में रहनेवाली विधा किनारे जा लगी है। ऐसी नैराश्य स्थिति में भी कई कवि एक जिद की तरह बेहतरीन कविताएं रचने की कोशिश कर रहे हैं। गीत चतुर्वेदी उन्हीं कवियों में एक हैं।
“आलाप में गिरह” गीत चतुर्वेदी की बेहतरीन कविताओं का संग्रह है। विष्णु खरे की मानें तो उन्होंने इन कविताओं के कोलाज से एक ‘विश्व – दृष्टि’ भी हासिल की है। गीत की संवेदनाएं व्यष्टि से समष्टि तक फैली – पसरी है। वे बार – बार जीवन में लय और सौंदर्य  पाने की कोशिश में कविताएं रचते जाते हैं। सुर यानी ईश्वर यानी सत्य, शिव और सौंदर्य को साधने की कोशिश करते हैं लेकिन हर बार उसमें गांठ पङ जाता है। ‘जाने कितनी बार टूटी लय / जाने कितनी बार जोङे सुर / हर आलाप में गिरह पङी है’। यह गांठ समय और समाज की विद्रूपताओं से ऊपजता है। मनुष्यता विरोधी कार्यवाही से। घृणा और नफरत से। सांप्रदायिक दंगे और गुंगा, बहरा एवं अंधा हो चुके लोकतांत्रिक प्रणाली से। सत्ता की आपराधिक चरित्र से। गीत की कविताएं इस यथार्थ के बरक्स ही नये यथार्थ की तलाश की कविताएं हैं।
बींसवी सदी के ढलते वर्षों ने ऐसे अंध बाजारीकरण, उपभोक्तावाद, विज्ञापनवाद और बाजार आधारित सौंदर्यवाद को जन्म दिया है जिसमें सौंदर्य के सारे प्रतिमान बदल गए हैं। सुघङ दिखना व्यक्ति की अपनी रुचि का मसला नहीं रह गया है बल्कि वह बाजार की जरुरत हो गया है। गीत ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ कविता में हमारे समय की इस विडम्बना को अभी – अभी जन्मे बच्चे के हवाले से तो उठाते ही हैं, प्राकृतिक सौंदर्य और जीवन के खिलाफ पूरी दुनिया में चल रही कृत्रिमता और बाजार की ठगी पर भी सवाल उठाते हैं –‘उसे दूध से नहला दूं ताकि वह गोरा हो जाए / क्या करूं उसके बालों का जो इतने घुंघराले हैं / उसकी नाक मेरे वक्त की प्रचलित नाकों – सी नहीं / गाल भी इतने फुगे – फुगे / क्या करूं इस चर्बी का, छील कर फेंक दूं’। 
अबाध गति से बहने वाला पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, मल्टीनेशनल कंपनियों के हितों में काम करने वाली लोकतांत्रिक सत्ताओं के गठजोङ ने दुनिया में दुखों और पीङाओं का निजीकरण और विकेंद्रीकरण कर दिया है। जैसे – जैसे उदारीकरण, निजीकरण और बाजारीकरण हमारी दुनिया में बढ़ा है खुशहाली सिमटी है। आत्महत्याएं बढ़ी है। लोग कंगाली की तरफ बढ़े हैं। दुखों का मकबरा पहाङ की ऊंचाई ले रहा है। लोगों की दिलों पर ‘नश्तर’ चलने लगे हैं। गीत अपनी कविताओं में ‘नश्तर’ के इस प्रयोग से खौफजदा हैं। उनके दुख का एक कारण यह भी है कि ‘हमारे खण्डहरों की मेहराबों पर आ – आ बैठती है भूखमरी’। भले ही हम सब एक तरीके से पैदा हुए हों लेकिन ‘हम सब अद्वितीय तरीकों से मारें जाएंगे’ क्योंकि अद्वितीय तरीके से मारने के लिए व्यवस्थाएं कटिबद्व है। वह रोज शक्तिशाली के हितों का पोषण कर रही है।
सभ्यताओं के बेहद विकृत और क्रूर रुप गीत चतुर्वेदी की कविताओं में जहां – तहां फैले पङे हैं। इतिहास में दफन हो चुके युद्वों को अपनी स्मृतियों में अब भी कवि ने समेट रखा है। वह जानता है कि सुपुर्दे खाक हो चुके अतीत उसका कुछ नहीं बिगाङेंगे लेकिन उसकी भयावहता से बच्चों को अब भी सावधान करता है। इस बात की तसदीक करता है कि अब युद्वों के लिए मैदान की जरुरत नहीं रही। अब यह गली नुक्कङ और मुहल्लों में बदल गया है। साम्राज्यवादी क्रूरताओं का ही एक रुप ‘राख – इराक’ कविता में मौजूद है। यह कविता ताकत, झूठ, फरेब और इंसानी नृशंस्तता की एक ध्रुवीयता को बयान करती है।
गीत चतुर्वेदी की कविताएं अनुभव के एकहरेपन के खिलाफ एक प्रतिसंवाद रचती नजर आती है। वह अपनी संवेदना के बहुआयामी धरातलों के स्पर्श की मांग करती दिखाई पङती है। उनकी कविता में जहां समय की बर्बरता, मनमानी, धोखा, हिंसा और त्रासदी अभिव्यक्त हुई हैं वहीं कहीं कोने में दबी – छुपी विवशताएं और बेबसी भी हैं। उदासी और नैराश्य भी। कुछ आत्मस्वीकृतियां भी। ‘मैं भय विनाश भूख और त्रासदी से निकला हूं / सिर्फ एक अनुभव से नहीं समझा जा सकता जिन्हें / सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाकु नहीं बनता’। यानी यथार्थ और प्रतियथार्थ के अंतर्गुम्फन में धंसे बगैर कविता अपने बहुलार्थ को खोलने से हिचकती है। इनकार करती है। क्योंकि यह कविता आंसूओं, दुखों और पीङाओं और उन्हीं के अवशेषों से रची हैं। गीत की कविता दुनिया के दुखों, तकलीफों के रंगों को समझने से पैदा हुई है।
सांप्रदायिक दंगों में मार दिए गए लोगों एवं गुमशुदा व्यक्तियों की तकलीफ अलग रंग की है तो शहर की सङकों पर अवारा घुम रहे पागलों की एक तरह की। उनकी जिनकी जमीन, जंगल, घर सब सत्ता के दलाल तथा कंपनियों ने छिन लिए और जिन्हें विस्थापित जीवन जीने के लिए बाध्य किया गया उनकी तकलीफें अलग रंग की हैं। ‘तुम कदम – कदम पर खीजते थे / चाहते थे कि तुम्हारे घर तक आए पानी / सूखा न रहे बाथरूम का नल / सिर्फ जन्मदिन पर खरीदनी पङे मोमबत्ती... अक्सर नहीं आता पानी / गुल रहती है बिजली’ – ये गांव से लेकर नगरीय जीवन के रोजमर्रा के दुख हैं जो बेहद सघन अनुभूतियों के साथ व्यक्त हुए हैं। सङक पर निर्वस्त्र घुम रही स्त्रियों को कवि ने व्यापकता दी है कि वह हमारे समाज के दुख के साथ एकाकार हो गया है। साथ ही एक धिक्कार और आक्रोश का मिश्रित भाव भी बहुत ही तीखे रुप में उभरा है – ‘ये हम कैसे दोगले हैं जो नहीं जुटा पाए इनके लिए तीन गज कपङा’।
गीत की अ – राजनीतिक लगने वाली कविताएं भी गहरे अर्थों में राजनीतिक है। वे मरने वाली हर लङकी चाहे जन्मी हो या अजन्मी को एक साजिश का हिस्सा मानते हैं। मुंबई के जीवन और वहां पसरे लुम्पेनिकता को भी खोल के रख दिया है। ठगी के कारोबार बेपर्दा किया है। विस्थापित जीवन की विडम्बनाओं को सामने रखा है। गीत चतुर्वेदी ने कस्बाई जीवन से लेकर नगरीय जीवन और उसमें समायी वैश्विक समस्याओं तक के अनुभव के विस्तार को अपनी कविता में संवेदात्मक जगह दी है। 
          
पुस्तक – आलाप में गिरह
लेखक – गीत चतुर्वेदी
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य – 195 रुपए

 
           
 

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

नीचे धरती ऊपर आकाश

               
             बींसवी सदी के ढलते वर्षों में आत्मकथा ने विधागत स्तर पर एक नयी पहचान बनानी शुरु की। यह पहचान उसे हाशिए की संवेदना और स्वानुभूति की अभिव्यक्ति के कारण मिली। ‘नेम नॉट नोन’ सुनीलकुमार लवटे की ऐसी आत्मकथा है जो हाशिए की संवेदना, स्वानुभूति, वैचारिकी और आत्मकथ्य की परिधि को न सिर्फ बढ़ाती है बल्कि दृष्टि और आयाम के नये फलक को खोलती है। मुख्यतौर पर अभी तक दलित और कमोवेश आदिवासी आत्मकथाओं ने ही पहचान बनायी थी, लेकिन अब वेश्याओं, नौकरानियों और अनाथों की आत्मकथाओं ने इसके व्यास को चौङा कर दिया है। सुनीलकुमार लवटे अनाथाश्रम में जन्मे, पले और बङे हुए हैं। मां, बाप, रिश्तेदारों से विहीन उन्होंने एक नम्बर (संख्या) के रुप में रिमांड होम में अपराधी बच्चों के बीच अपनी आंखे खोली है। जिनके नाम की जगह लिखा था ‘नेम नॉट नोन’। लेकिन वे आज ‘वेलनोन’ सोशल एक्टिविस्ट, लेखक, अनुवादक, समीक्षक और प्राचार्य हैं। महज एक संख्या से चर्चित संज्ञा बनने के उनके संघर्षमय जीवन की जीवंत दास्तान को इस आत्मकथा में पढ़ा जा सकता है। लवटे लिखते हैं – ‘मेरी जमीन प्रश्नों से लबालब भरी थी। मेरे जन्म से पहले ही जन्मदाता पिता विश्वामित्र बन गए, इसलिए जन्म देनेवाली मॉ ने आजीवन कुंती बने रहना पसंद किया। इसी कारण मेरे नसीब में अनाथाश्रम की जिंदगी आई। मैं अनाथाश्रम में ही पला – बढ़ा... मेरी फाइल में मनुष्यता के कोई निशान नहीं थे... मैं था केवल पुरुष जाति का एक मामूली जीव... इसीलिए मेरा नाम नहीं था। पहचान के तौर पर केवल कोर्ट द्वारा दिया गया एक नंबर था... फाइल के अनुसार मैं ‘नेम नॉट नोन’ था। मूलत: मेरे मनुष्य होने को ही नकारनेवाले इस समाज ने मेरी उम्र तक एक्स – रे मशीन से तय की थी’।  
यह एक हीरोइक आत्मकथ्य है। समाज में फैले यथास्थितिवाद को तोङने वाला। संरचनात्मक स्तर पर बदलाव लाने के लिए अदम्य जिजीविषा का परिचय देने वाला। व्यवहारिक जीवनसंग्राम में कूदनेवाला। जीवन, कर्म और दृष्टि के बीच अटूट संबंध बनाने वाला। यही कारण है कि यह आत्मकथा दलित आत्मकथाओं से कई मायनों में अलग है। दलित आत्मकथाओं में लेखक का जीवनसंघर्ष, उसकी यातना, उपेक्षा, उत्पीङन का जिक्र तो मिलता है, यहां तक कि सफल होने और बेहतर मेट्रो जीवन जीने का भी। लेकिन अपनी स्वानुभूति को स्वविवेक में बदलकर उस कलुषित और उपेक्षित जीवन को बदलने के लिए ताउम्र संघर्ष करने की नहीं। प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष करना और बने - बनाये सांचे को तोङकर उसे बदल देना, साधारण बात नहीं है। सुनीलकुमार लवटे ने यह किया है जिसके विवरण और प्रमाण आत्मकथा में फैले हैं।
    सुनीलकुमार लवटे को जो जीवन हासिल था उसे वे इन शब्दों में परिभाषित करते हैं – नीचे धरती, ऊपर आकाश। दलित जीवन से भी उपेक्षित जीवन था उनका। या कहें अनाथों का जीवन दलितों से भी ज्यादा भयावह है। लवटे का जन्म सुमन नाम की कुवांरी मां की कोख से ऐसे आश्रम में हुआ जहां कोई कुवांरी माता होती, कोई विवाहेतर नाजायज संबंधों के कारण बनी माता होती तो कोई परित्यक्ता। जन्म देकर सुमन बच्चे को आश्रम के भरोसे छोङ गयी। तब उमाबाई ने अपने बच्चों के साथ इसे भी पाला – पोसा। आश्रम ही घर बना। यहीं पल रहे लङके और लङकियां भाई – बहन। नाते – रिश्तेदार। इन मुंहबोले रिश्तों में खून के रिश्ते से ज्यादा उष्मा और सहजता थी। जिसे समाज ने ठुकराया था, रिश्ते और संबंधों से अलगकर अभिशप्त जीवन दिया था उसे आश्रम ने जीवन दिया, लङखङाते पांवों को ताकत और अकृत्रिम संबंध भी। इन संबंधों को लवटे ताउम्र निभाते हैं। हर बार उसे मानवीय तरीके से परिभाषित करने की भी कोशिश करते हैं। साथ ही समाज में नक्कारा किस्म की जीवित संबंधों की जटिलता, तिकङम, स्वार्थ और अवसरवादी रवैये पर टिकी इस व्यवस्था की व्यंग्यगात्मक आलोचना भी करते हैं।  
हर समाज अपने उजाले के बीच अंधेरे को निष्पाप साबित करने के लिए ऐसे आश्रम या अनाथालय बनाकर रखता है जिसमें उसकी चादर उजली लगे। अनाथ बच्चों के जन्म की पूरी जबाबदेही स्त्रिओं के सिर मढ़ दी जाती है। फिर उसे आश्रम जैसे जगहों में नजरबंद कर दिया जाता है। आश्रम मर्दाना समाज की झूठी नैतिकता, प्रतिष्ठा और पवित्रता पर पर्दे डालने का काम करता है। लवटे आश्रम को करुणालय की संज्ञा इसीलिए देते हैं कि यह मानव अधिकारों से अपह्रत जिन्दगी को जीवन देता है। उपेक्षितों, वंचितों, यतिमों को अपनी कोख में पालता है / जगह देता है। लवटे आश्रम की आंतरिक संरचना की चर्चा करते हैं। और दैनिक जीवन में आनेवाली मुश्किलों तथा यांत्रिक जीवनशैली से पाठकों को रु – ब – रु कराते हैं। सामाजिक रुप से बहिष्कृत यह आश्रम, समाज के सभ्य लोगों के लिए महज एक अजायबघर से ज्यादा कुछ नहीं था / है। तथाकथित सभ्य लोगों द्वारा और सरकारी अनुदान से चलनेवाले इस आश्रम में लवटे का बचपन गुजरा। तीसरी कक्षा में दाखिले के वक्त लवटे को कोल्हापुर के रिमांड होम में ले जाया गया। रिमांड होम की संरचना आश्रम से भी भयावह थी। लगभग सैन्यीकृत ढंग की। आश्रम में मातृत्व की भावना थी जबकि रिमांड होम लगभग पितृसत्तात्मक। सफाई, भोजन, बर्तन, कपङे से लेकर टायलेट साफ करने और फर्श पोंछने तक का काम करना पङता था। सरकारी पैसे और संसाधन की लूट होती थी। और बच्चों को नारकीय जीवन जीने को मजबूर होना पङता था। रिमांड होम एक किस्म से जेल की कैदखाना थी। बाबजूद इसके लवटे ने अपना जीवन संघर्ष जारी रखा। प्राध्यापक उसके जीवन की ताकत बन कर उभरे। हर संभव मदद की। राष्ट्र निर्माण के उस दौर में प्राध्यापकों के अंदर नैतिकता और आदर्श भरे थे। नये भारत के निर्माण का सपना उनके मन में बसा था। पैसे, ज्ञान और सहानुभूति तीनों हासिल करने में लवटे सफल रहे। पढ़ाई आगे बढ़ती गयी और मुश्किलें आसान। मेहनत और विश्वास ने रंग दिखाया। अनाथाश्रम – रिमांड होम के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि लवटे को ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट’, कॉलेज डिग्री और ‘रोल ऑफ ऑनर’ की हैट्रिक हासिल हुई।
इन्हीं वर्षों में लवटे की रचनात्मकता ने जन्म लिया। साहित्यिक गोष्ठियों में शिरकत बढ़ी। वे प्राध्यापक बनने में सफल रहे। अब तक का संघर्ष सफल होने को दर्ज करती है। इसके बाद संघर्ष के ढंग में बदलाव आता है। चुनौतियां मुंह बाये खङी होती है। वे ऐसे स्कूल में प्राध्यापक बनते हैं जहां बुनियादी सुविधा तक हासिल नहीं है। यहां तक कि पढ़ने के लिए छात्रों को जमा करना, उन्हें स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित करने तक का भी काम करना पङता है। लेकिन उन्होंने लगन और मेहनत से सब कर दिखाया। प्राध्यापकीय व्यावहारिकता से निरंतर अपने ज्ञान, सोच और दृष्टि में परिवर्त्तन लाते गये। अपने जीवन में लगातार कैसे विकास किया जाए और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी बचाये रखा जाए इस दृष्टिकोण से भी आत्मकथा को पढ़ा जा सकता है।
लवटे ने स्कूल की मास्टरी करते हुए पीएच.डी की डिग्री हासिल की। संघर्ष का एक रुप यहां भी दिखता है। जिस स्कूल में पढ़ा वहीं टीचर हो गये। यह बहुत बङी उपलब्धि थी। स्कूल में आंतरिक लोकतंत्र कायम करने के लिए भी जद्दोजहद की। बाद में स्कूल की स्थायी नौकरी छोङकर अस्थायी रुप में कॉलेज ज्वाइन किया। जीवन के आदर्श को मूल्य की तरह मानते हुए आश्रम में ही पली-बढ़ी रेखा से विवाह किया। और धीरे – धीरे रिमांड होम के लिए काम करने लगे। इस आत्मकथा की ताकत यही है कि सफल होने के बाद भी लवटे में सफलता की मदहोशी नहीं छाई। उन्होंने अपनी दृष्टि और उर्जा को रिमांड होम को बेहतर बनाने में झोंक दिया। संस्था को मानवीय चेहरा प्रदान किया। नीरस जीवनशैली को तोङ नये रस का संचार किया। रिमांड होम को ‘घर’ का स्वरुप प्रदान किया। उसे मातृमयी बनाया। ममता के संचार से स्नेह – सहयोग बढ़ा। अब लोग नंबरों से नहीं, नाम से पुकारे और पहचाने जाते थे। यह मामूली परिवर्त्तन नहीं है। धीरे – धीरे उन्होंने रिमांड होम और उस जैसी अन्य संस्थाओं के नाम बदल दिए। नाम का बदलना दरअसल दृष्टि और विचारधारा का बदलना था। संस्था के भीतर नये युग के आगमन की सूचना थी। लवटे ने अपने प्रयास से उसे सांस्कृतिक केंद्र में बदलने की कोशिश की। उसमें भी सफल रहे। ऐसा भी वक्त आया जब संस्था को देश – विदेश से मदद मिलने लगी। बच्चों को गोद लिए जाने के लिए समारोह आयोजित किए जाने लगे। बच्चों को विदेश तक भेजा जाने लगा। अनाथ, उपेछित, बेसहारा बच्चे सनाथ होने लगे। उन्हें बेहतर जीवन और समाज मिलने लगा। वे सफल होकर डाक्टर, इंजीनियर, टीचर बनने लगे।
लेकिन संस्था को इस मुकाम तक पहुंचाने में लवटे ने अपना जीवन झोंक दिया। सामाजिक कार्यकर्ता के अनुभव के कारण उन्होंने सार्क बालिका वर्ष, बालन्याय अधिनियम, बच्चों की वैश्विक दशा, वंचित विकास, दत्तक समस्या, महिला मुक्ति, अपाहिज पुनर्वासन जैसे विषयों पर विशेषांक भी निकाला। सामाजिक सोच में बदलाव लाया। यही स्वानुभव और कर्मशीलता उन्हें अन्य आत्मकथाकारों से अलग करती है तथा दूसरों के सामने चुनौती के रुप में रखती है।
लवटे की इस आत्मकथा से गुजरते हुए हम संघर्ष और रचनात्मकता के जिस अद्वितीय मेल को यहां पढ़ते हैं वह असाधारण है। यह उम्मीद भी जगती है कि अभी सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है। राजनीति, भ्रष्टाचार, अवसरवाद और स्वार्थ ने सबकुछ निगल नहीं लिया है। इच्छाशक्ति, दृढ़निश्चय और दृष्टि हो तो अबूझ और लालफीताशाही के जटिलतंत्र के भीतर भी बदलाव की बयार बहाई जा सकती है। साहित्यिक और सामाजिक मोर्चे पर आज भी सुनीलकुमार लवटे सक्रिय हैं यह बेहद आश्वस्तिकारक और प्रीतिकर है। यह आत्मकथा आत्मप्रशंसा के लिए नहीं लिखा गया है दुष्यंत के शब्दों में कहें तो- ‘कोई हसीन नजारा तो है नजर के लिए’।             
पुस्तक - नेम नॉट नोन
लेखक – सुनीलकुमार लवटे
प्रकाशक - राधाकृष्ण, नयी दिल्ली
मूल्य - 250 रुपये

                                        राजकुमार

   

रविवार, मार्च 13, 2011

दलित साहित्य का फैलता कैनवस

 

मराठी दलित साहित्य ने साहित्यिक सौंदर्यशास्त्र का नया प्रतिमान गढ़ा है। वह जितनी अपनी रचनात्मकता के कारण चर्चित हुई उतनी ही साहित्य की अभेद स्थापित अभिजात्य मूल्यों के प्रतिरोध के कारण। उसने साहित्य की तमाम परंपरागत मानदंडों, प्रतिमानों, मूल्यों और उन विचार सरणियों को तोङने का काम किया जो वृहत्तर मानवीय मूल्यों के नाम पर सरहानीय थे लेकिन अपनी सोच के सीमित दायरे में लिपटे थे। उनका दायरा सीमित है यह बात भी दलित साहित्य से मिलने वाली चुनौतियों और तीखे प्रश्नों से उभरकर सामने आए। लेकिन यह कार्रवाई भी एकतरफा नहीं रही। दलित साहित्य और उसकी रचनात्मकता की विस्फोटक विधा ‘आत्मकथा(ओं)’ पर भी तीखे प्रहार किए गए। एक बहुत ही जरुरी सवाल यह उठा कि दलित आत्मकथाएं अपने जीवन के इर्द – गिर्द ही घुमती रहती है। वह वृहत्तर मानवीय दायरे को अपने भीतर नहीं समेटती है। आत्मश्लाघा से ग्रस्त है। समाज को बदलने वाले तमाम बङी अवधारणाओं और विचारों को रिजेक्ट करती है। निश्चित रूप से यह जरुरी सवाल हैं और इन सवालों को मराठी दलित साहित्यकार, चिंतक, अर्थशास्त्री और शिक्षाविद भालचंद्र मुणगेकर अपनी आत्मकथा “मेरी हकीकत” में ध्वस्त करते हैं।
“मेरी हकीकत” में भालचंद्र मुणगेकर के जीवन के शुरुआती दिनों के संघर्ष को अभिव्यक्ति मिली है। यह आत्मकथा लेखक के सफरनामे को पूरी तरह व्यक्त नहीं करता है। लेकिन मुम्बई विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार की योजना आयोग के सदस्य और इंडियन इंस्टीट्युट ऑफ एडवांस स्ट्डीज, शिमला के अध्यक्ष बनने के सफरनामे में जिन चीजों, घटनाओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों की भूमिका रही है सबको व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करती है।        
‘मेरी हकीकत’ में आत्मश्लाघा के अंश नहीं है। इसे ‘व्यक्ति पूजा’ की तरह भी नहीं पढ़ा जा सकता है। व्यक्तित्व का निर्माण एवं विकास का प्रक्षेपण इसमें जरुर है लेकिन वह उन तमाम हाशिए पर पङे लोगों और वंचित समाज के लिए आदर्श नजीर प्रस्तुत करती है जो भूख, अभाव और वर्णवादी दंश के भीतर जीवन जीते हैं। सुनील कुमार लवटे की मानें तो ‘यह आत्मकथा लेखक के होश संभालने तक के अठारह वर्ष की ऐसी विकासगाथा है जो ‘दलित’ सीमा को लांघकर मनुष्य़ की जिजीविषा का एक अदम्य स्त्रोत बनकर उभर आती है’।
यूं तो भालचंद्र के जीवन पर अन्य दलित लेखकों की तरह ही अम्बेडकर के जीवन और दर्शन का गहरा प्रभाव पङा है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि वे जिन पांच तत्वों से अपने जीवन को संचालित मानते हैं या जिसके आसपास अपने को मससूस करते हैं वे उन्हें चिंतन के स्तर पर राममनोहर लोहिया के नजदीक खङा करती है। यह और बात है कि आत्मकथाकर ने लोहिया का नाम नहीं लिया है। भालचंद्र जाति और अस्पृश्यता निर्मूलन, स्त्री – पुरुष समानता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक समाजवाद और मानवतावाद जैसे मूल्यों एवं तत्वों से अपने को संचालित महसूस करते हैं।
भालचंद्र इन मूल्यों के उल्लेख्य से कहीं न कहीं उन तर्कों का खंडन भी करते हैं जो यह कहता है कि दलित साहित्य अपनी परिधि और स्वयं के बनाये खोल से बाहर नहीं निकलता है। भालचंद्र का तर्क है कि ‘गुलामी मानवी समाज के विकास की अत्यंत मिलावटी और अनैतिक व्यवस्था है। मनुष्यों की खरीद बिक्री होना यानी उसका मनुष्यत्व को नकारना’ है। अस्पृश्यता गुलामी से भी बदतर बात है। भालचंद्र का कहना है कि जाति – व्यवस्था ने नैतिकता के सारे मानदंड को ध्वस्त कर दिया है। इसी की वजह से सत्ता, संपत्ति और प्रतिष्ठा के भीतर विषम विभाजन बना है। इसलिए इसका विरोध जरुरी है। इसके निर्मूलन के बगैर भारत एक सुसंस्कृत, अखंड और समर्थ राष्ट्र के रूप में खङा नहीं हो सकता।
भालचंद्र ज्योतिबा फूले की तरह ही स्त्री मुक्ति का सवाल उठाते हैं। उसके दुख – दर्द, अथक परिश्रम के प्रति करुणार्द्र हो उठते हैं। उन्हें पुरुषों की कष्ट की तुलना में स्त्रियों का कष्ट अधिक मूल्यवान लगता है। बहुभाषिक, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज में उन्हें धर्मनिरपेक्षता की बहुत जरुरत महसूस होती है। वे धर्मनिरपेक्षता की नयी परिभाषा गढ़ते हुए कहते हैं कि विवेक, संयम, सहनशीलता और दूसरों के प्रति आदर का भाव ही धर्मनिरपेक्षता है।
प्रजातांत्रिक समाजवाद में विश्वास रखने वाले भालचंद्र मानते हैं कि भूख, बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी से मुक्ति ही स्वतंत्रता है। यही आत्मसम्मान है। आर्थिक विषमता की खाई पाटे बगैर और हर व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा दिए बगैर राजकीय प्रजातंत्र को हासिल नहीं किया जा सकता है। यह हमारे सामने एक कठिन चुनौती है जिससे लङना ही होगा। मानवी समाज से प्रेम करना ही मानवतावाद है। लेकिन जाति, वर्ण, क्षेत्र, रंग, धर्म, अलग संस्कृति में विभाजित हमारा समाज भातृत्व प्रेम को सहेज नहीं रहा है। संसाधनों पर कब्जे की लङाई, राष्ट्र के प्रति अनुदारता युद्ध, दंगे आतंकवाद आदि इसे भंग करते रहते हैं। भालचंद्र एक राष्ट्रवादी विमर्शकार की तरह इससे लङने की चुनौती को सामने रखते हैं।
भालचंद्र अपने जीवन में उभरे इन मूल्यों को तीन बातों से निर्मित मानते हैं। पहला, पिता की व्यक्तिगत जीवन। दूसरा, गुरु और तीसरा मराठी साहित्य। भालचंद्र मानते हैं कि मेरे पहले गुरु मेरे पिता हैं। वहीं मेरे जीवन के शिल्पकार हैं। वे अपने उन सगे संबंधियों को भी याद करते हैं जिन्होंने इनके जीवन को बनाने में बहुत त्याग किया है। वे शरतचंद्र, अनंतराव चित्रे, बा.बा. ठाकुर और लीला आवटे आदि शिक्षकों के प्रति भी असीम श्रद्धा से भरे हैं जिन्होंने इनके जीवन को दिशा दी। गुरु की महत्ता को इन्होंने पूरी ताकत से स्थापित किया है। जो इन दिनों विरल होती जा रही है। अच्छा अर्थशास्त्री बनने की बात उन्होंने अपने गुरुओं से ही सिखी। वे मानसिक भावविश्व के निर्माण का श्रेय मराठी साहित्य को देते हैं।
दुख, दारिद्रय, अभाव, भूख, जातिय - वर्णवादी दंश के बीच ही बचपन में किसी व्यक्ति के मानसिक गठन का निर्माण कैसे होता है? वह किन – किन चुनौतियों और सवालों से टकराता है? उपेक्षित और कमतर मनुष्य होने का भाव कैसे उसके विशाल मानस को तोङती है? कुंठाओं की एक भयावह दुनिया कैसे अस्तित्व में आती है? ये बेहद बेचैन करने वाले प्रश्न हैं। भालचंद्र मुणगेकर का नैरेटर इन सवालों से न जूझता आया है बल्कि उसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी आत्मकथा के माध्यम से सामने लाया है। कुल मिलाकर कहें तो यह आत्मकथा दलित साहित्य के कैनवास को फैला देता है।

                                                                  पुस्तक – मेरी हकीकत
                           लेखक – भालचंद्र मुणगेकर