शनिवार, मई 14, 2011

जीवित सपनों का ठूंठ हो जाना

 
प्रभात रंजन की आठ कहानियों का नया संग्रह ‘बोलेरो क्लास’ आया है। यूं तो ज्यादातर कहानियां पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। बाबजूद इसके इन कहानियों को पुस्तकाकार रूप में पढ़ना इसलिए अलग है क्योंकि ज्यादातर कहानियां छोटे – छोटे शहरों मसलन मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी से होते नेपाल के बार्डर एवं उन्हीं इलाकों के कस्बाई एवं ग्रामीण जीवन के संदर्भों का कोलाज बनाते हुए आगे बढ़ती है। ये कहानियां ठेठ स्थानीय संदर्भों से जुङकर भी व्यापक दायरे को समेटती है। यह जितनी उत्तरी बिहार के लोकल यथार्थ को परद दर परत उघाङती, उतना ही बिहार के अन्य भागों पर भी लागू होती है। स्थान और परिवेश के बदलाव कहानियों के स्वरूप को न तो बिगाङते हैं न ही आस्वाद की प्रक्रिया को भंग करते हैं। बदलाव की यह प्रक्रिया चौतरफा देखी जा सकती है। ये कहानियां विकास की नयी पेंचदार, जटिल और बिडम्बनात्मक असाधारण स्थितियों का बयान करती हैं। नवयुवकों के आगे बढ़ने की महत्वकांक्षा, उसके ऊंचे – ऊंचे सपने, आसमां की बुलन्दियों में उङने की लालसा, वक्त के साथ कदमताल करने की कोशिश, आर्थिक समृद्धि के प्रति ललक, झलक मारती है। लेकिन अवसरों का बंद दरवाजा, बेरोजगारी, श्रमहीनता के साथ आगे बढ़ने की कोशिश उन्हें अंधी अपराधिक सुरंगों में धकेल देती है।
निश्चित स्थान और परिवेश के बुनाबट के भीतर ये कहानियां अपने समय के गंभीर सवालों से बिंधी है। वैश्विक आर्थिक – सांस्कृतिक चिंताएं, मल्टीनेशनल कंपनियों की साम्राज्यवादी नीतियां, चमकता – दमकता पसरता बाजार और लालच की दुनिया, सामाजिक – राजनीतिक रुतबे के साथ – साथ अमीरी के घोङे पर सवारी, तस्करी और अपराध के सहारे जैसे – तैसे सफल हो जाने की प्रवृति और धूरीहीन लोकल राजनीति की बिडम्बनाओं एवं विद्रूपताओं से नत्थी ये कहानियां वक्त के उजले दीवार पर कालिख पोतती चलती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो  पिछले पंद्रह – बीस वर्षों की तेज आर्थिक – राजनीतिक – सामाजिक बदलाव ही कथा में रूपकों बनकर आए हैं। यह बदलाव जितना आंतरिक स्तर पर घटित हुआ है उतना ही वैश्विक स्तर पर। बदलाव के दोनों रूप एकाकार होकर हिंदुस्तानी गांवों और समाजों को जिस कदर बदल रहे हैं, उसकी रूपात्मक - कथात्मक अभिव्यक्ति ‘बोलोरो क्लास’ में पढ़ी जा सकती है।
 ‘इंटरनेट, सोनाली और सुबिमल मास्टर की कहानी’ आंशिक एकतरफा प्रेमकथा का अहसास कराती हुई फरेब की बङी दुनिया की कथा कहती है। सुबिमल मास्टर अपने अंदर पटकथा लेखक का सपना पाले टीवी की दुनिया में शामिल होने निकल जाता है। लेकिन उसी सोनाली के द्वारा छला जाता है जिसके सपने देखता है। जिसपर उसे भरोसा है। जिसके सहारे अपनी सफलता और प्रतिभा के झंडे गांङने के ख्बाब देख रहा था। सफलता के बाजार में मानवीय संबंध, भरोसा और प्रेम सब बेमानी हो गए हैं। तकनीक और भोलेपन का संबंधवैचित्र्य सुबिमल को अपराधी ठहरा देता है। सोनाली छल और फरेब के सहारे सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंच जाती है। यह कथा कस्बाई सपने का महानगरीय चकाचौंध में समाप्ति की बारीक ट्रैजिक आख्यान को सामने रखती है।
प्रभात रंजन ने अपनी कथा टेक्नीक में आउटसाइडर और इनसाइडर दोनों ही नैरेटर का इस्तेमाल बखूबी किया है। यही वजह है कि वे आख्यान को मनमाफिक रूप में खींचते चलते हैं। अवांतर प्रसंगों से मूल कथा के मांस - मज्जा को तैयार करते हैं। ऐसा करते हुए वे बहकते या भटकते नहीं हैं बल्कि मूलकथा में ताकत भरने की कोशिश करते हैं। वे उपकथाओं की शृंखलाएं बनाते हैं। जहां कहीं भी कथावाचक का आभाव दिखता है वहां लेखक बार – बार यह बताने की कोशिश करता है कि ऐसा लोगों का मानना है, फलाने के मुंह से सुनी गई है, अफवाहों से पता चला है, लोक किवदंति है, अखबार या टीवी ने ऐसा बताया है। कथा कहने कि यह नैरेटिंग टेक्नीक न सिर्फ आकर्षक, प्रभावशाली बन पङी है बल्कि बेहद विश्वसनीय और कस्बाई कथा के उपयुक्त भी। प्रभात कथा को आमतौर पर सपाट दौङाते हैं। वे नाटकीयता के बजाए जंपिंग में ज्यादा भरोसा करते हैं। वे जरुरी होने पर एक प्रसंग से दूसरे पर जंप करते हैं।
     ‘फ्रांसीसी रेड वाइन’ भी चंद्रचूङ के बिखरते सपने के आख्यान का बयान करती है। उपहार में मिले वाइन की महिमा को प्रभात ने तरह – तरह से कथा में इस हद तक उभारा है कि वह स्टैटस सिंबल के अलावा सभी परेशानियों से मुक्ति का हल बन जाता है। चंद्रचूङ यह मानने लगते हैं कि छोटे शहर में इस रेड वाइन के सहारे नेता, अफसर, मंत्री, गुंडे सभी को साधा जा सकता है। भविष्य निर्मात्री यह वाइन उसी को भेंट दिया जाए जिनसे काम साधा जा सके। स्टैटस हासिल किया जा सके। सुरक्षा भी। लेकिन अंतत: वह पत्नी से टूट कर बिखर जाता है और उसके सपने बिखर जाते हैं। इस कथा में वाइन के बहाने सामाजिक मानसिकता, दफ्तरी नौकरशाही लोकतंत्र और असुरक्षित साधारण नागरिक की कथा को सामने रखा गया है।
प्रभात ने बहुत ही साधारण और वास्तविक पात्रों के माध्यम से अपनी कहानी को कहने की कोशिश की है। ‘फाव की जमीन’ भूमाफिया के बढ़ते आतंक को मेटाफर बनाकर प्रस्तुत करता है। मल्टीनेशनल कंपनियों के हितों को साधती विकास की भूखी सरकारें, राजनीतिक अखाङे के पहलवान और लोकल रंगदारों की नजर किस हद तक बेशकीमती जमीनों के अधिग्रहण एवं कब्जे पर है, इसका नजारा यहां देखा जा सकता है। यह जमीन जो चितरंजन बाबू का सपना था, सरकार औने – पौने दामों में अधिग्रहित कर लेती है। और लोगों के लिए छोङ देती है तो महज दंतकथाएं। फाव की जमीन फाव में चली गई।
     ‘अथ कथा ढेलमरवा गोसाईं’ भगत जी के जीवन संघर्षों और विक्षिप्तताओं के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे प्राकृतिक संसाधनों की लूट – खसोट और तस्करी के रूपक को सामने लाता है। लोक जीवन में आयुर्वेदिक चिकित्सा मुफ्त सेवा थी जिसे बङी – बङी कंपनियों ने हथियाकर बाजार और उसके माध्यम से धन उगाही का जरिया बना लिया। प्रभात अपनी इस कहानी से एक ऐसे महाआख्यान को रचते नजर आते हैं जिसमें साधारण हुनरमंद व्यक्ति बङी सत्ताओं और बाजार के खिलाङियों के आगे दम तोङता नजर आ रहा है। इंदर सत्याग्रही भी राजनीतिक लुच्चई और बङबोले मीडिया का गंभीर शिकार बनता है। आज बोलोरो क्लास समाज की मानसिकता है। यह ऐसी अभेद संरचना बनती गई है जिसमें नैतिकता, ईमानदारी, श्रम और आदर्श के लिए कोई जगह नहीं बची है। बोलेरो क्लास षडयंत्र, अपराध, देह व्यापार और राजनीतिक रंगदारी के कुचक्र से गुथा है। जो लगभग आबोहवा बनती जा रही है।    
प्रेम और कैरियर के महीन धागों से बुना आख्यान ‘एक प्रेम कहानी का अनुवाद’ है। प्रेम असली संघर्ष का रूप तब लेता है जब जातिगत विषमताएं और मनचाही कैरियर की फिसलन भरी सङकें सामने आ जाती है। एकतरफ कथानायक का कैरियर में असफलता तो दूसरी तरफ नायिका का प्राइवेट कंपनी में तनावपूर्ण अनुवाद प्रोजेक्ट और उस बीच परिवार का दबाब प्रेम के स्वर को उल्लास में बदलने के बजाए निराशा के रास्ते ढकेलता रहता है। इन्हीं निराशाओं और आशंकाओं के बीच यह प्रेम झुलता रहता है।   
प्रभात कस्बाई जीवन के देखे चरित्र, जीवन शैली, मुहावरे, भाषा और लोक फंतासी के सहारे ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं। भाषा में सहजता, रवानगी, साफगोई निश्चित रूप से आकर्षित करते हैं। पठन के लिहाज से भाषा कभी पाठकों के बीच बाधक नहीं बनती है।
पुस्तक – बोलेरो क्लास
लेखक – प्रभात रंजन
प्रकाशक – प्रतिलिपि बुक्स, जयपुर
मूल्य – एक सौ पचास रुपये


शुक्रवार, मई 06, 2011

बहुआयामी अनुभूति के रंग

                       
 पिछला एक दशक हिन्दी कविता के लिए अप्रत्याशित रूप से निराश करने वाला रहा है। अनुभव का एकहरापन, घिसी – पिटी संवेदना, कल्पना और शिल्प में ठहराव ने इसके पांव रोक रखे हैं। यह अपनी पूर्ववर्ती कविता की नकल से ही ऊर्जा खिंचने की कोशिश करती रही है। यही वजह है कि हमेशा मुख्यधारा में रहनेवाली विधा किनारे जा लगी है। ऐसी नैराश्य स्थिति में भी कई कवि एक जिद की तरह बेहतरीन कविताएं रचने की कोशिश कर रहे हैं। गीत चतुर्वेदी उन्हीं कवियों में एक हैं।
“आलाप में गिरह” गीत चतुर्वेदी की बेहतरीन कविताओं का संग्रह है। विष्णु खरे की मानें तो उन्होंने इन कविताओं के कोलाज से एक ‘विश्व – दृष्टि’ भी हासिल की है। गीत की संवेदनाएं व्यष्टि से समष्टि तक फैली – पसरी है। वे बार – बार जीवन में लय और सौंदर्य  पाने की कोशिश में कविताएं रचते जाते हैं। सुर यानी ईश्वर यानी सत्य, शिव और सौंदर्य को साधने की कोशिश करते हैं लेकिन हर बार उसमें गांठ पङ जाता है। ‘जाने कितनी बार टूटी लय / जाने कितनी बार जोङे सुर / हर आलाप में गिरह पङी है’। यह गांठ समय और समाज की विद्रूपताओं से ऊपजता है। मनुष्यता विरोधी कार्यवाही से। घृणा और नफरत से। सांप्रदायिक दंगे और गुंगा, बहरा एवं अंधा हो चुके लोकतांत्रिक प्रणाली से। सत्ता की आपराधिक चरित्र से। गीत की कविताएं इस यथार्थ के बरक्स ही नये यथार्थ की तलाश की कविताएं हैं।
बींसवी सदी के ढलते वर्षों ने ऐसे अंध बाजारीकरण, उपभोक्तावाद, विज्ञापनवाद और बाजार आधारित सौंदर्यवाद को जन्म दिया है जिसमें सौंदर्य के सारे प्रतिमान बदल गए हैं। सुघङ दिखना व्यक्ति की अपनी रुचि का मसला नहीं रह गया है बल्कि वह बाजार की जरुरत हो गया है। गीत ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ कविता में हमारे समय की इस विडम्बना को अभी – अभी जन्मे बच्चे के हवाले से तो उठाते ही हैं, प्राकृतिक सौंदर्य और जीवन के खिलाफ पूरी दुनिया में चल रही कृत्रिमता और बाजार की ठगी पर भी सवाल उठाते हैं –‘उसे दूध से नहला दूं ताकि वह गोरा हो जाए / क्या करूं उसके बालों का जो इतने घुंघराले हैं / उसकी नाक मेरे वक्त की प्रचलित नाकों – सी नहीं / गाल भी इतने फुगे – फुगे / क्या करूं इस चर्बी का, छील कर फेंक दूं’। 
अबाध गति से बहने वाला पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, मल्टीनेशनल कंपनियों के हितों में काम करने वाली लोकतांत्रिक सत्ताओं के गठजोङ ने दुनिया में दुखों और पीङाओं का निजीकरण और विकेंद्रीकरण कर दिया है। जैसे – जैसे उदारीकरण, निजीकरण और बाजारीकरण हमारी दुनिया में बढ़ा है खुशहाली सिमटी है। आत्महत्याएं बढ़ी है। लोग कंगाली की तरफ बढ़े हैं। दुखों का मकबरा पहाङ की ऊंचाई ले रहा है। लोगों की दिलों पर ‘नश्तर’ चलने लगे हैं। गीत अपनी कविताओं में ‘नश्तर’ के इस प्रयोग से खौफजदा हैं। उनके दुख का एक कारण यह भी है कि ‘हमारे खण्डहरों की मेहराबों पर आ – आ बैठती है भूखमरी’। भले ही हम सब एक तरीके से पैदा हुए हों लेकिन ‘हम सब अद्वितीय तरीकों से मारें जाएंगे’ क्योंकि अद्वितीय तरीके से मारने के लिए व्यवस्थाएं कटिबद्व है। वह रोज शक्तिशाली के हितों का पोषण कर रही है।
सभ्यताओं के बेहद विकृत और क्रूर रुप गीत चतुर्वेदी की कविताओं में जहां – तहां फैले पङे हैं। इतिहास में दफन हो चुके युद्वों को अपनी स्मृतियों में अब भी कवि ने समेट रखा है। वह जानता है कि सुपुर्दे खाक हो चुके अतीत उसका कुछ नहीं बिगाङेंगे लेकिन उसकी भयावहता से बच्चों को अब भी सावधान करता है। इस बात की तसदीक करता है कि अब युद्वों के लिए मैदान की जरुरत नहीं रही। अब यह गली नुक्कङ और मुहल्लों में बदल गया है। साम्राज्यवादी क्रूरताओं का ही एक रुप ‘राख – इराक’ कविता में मौजूद है। यह कविता ताकत, झूठ, फरेब और इंसानी नृशंस्तता की एक ध्रुवीयता को बयान करती है।
गीत चतुर्वेदी की कविताएं अनुभव के एकहरेपन के खिलाफ एक प्रतिसंवाद रचती नजर आती है। वह अपनी संवेदना के बहुआयामी धरातलों के स्पर्श की मांग करती दिखाई पङती है। उनकी कविता में जहां समय की बर्बरता, मनमानी, धोखा, हिंसा और त्रासदी अभिव्यक्त हुई हैं वहीं कहीं कोने में दबी – छुपी विवशताएं और बेबसी भी हैं। उदासी और नैराश्य भी। कुछ आत्मस्वीकृतियां भी। ‘मैं भय विनाश भूख और त्रासदी से निकला हूं / सिर्फ एक अनुभव से नहीं समझा जा सकता जिन्हें / सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाकु नहीं बनता’। यानी यथार्थ और प्रतियथार्थ के अंतर्गुम्फन में धंसे बगैर कविता अपने बहुलार्थ को खोलने से हिचकती है। इनकार करती है। क्योंकि यह कविता आंसूओं, दुखों और पीङाओं और उन्हीं के अवशेषों से रची हैं। गीत की कविता दुनिया के दुखों, तकलीफों के रंगों को समझने से पैदा हुई है।
सांप्रदायिक दंगों में मार दिए गए लोगों एवं गुमशुदा व्यक्तियों की तकलीफ अलग रंग की है तो शहर की सङकों पर अवारा घुम रहे पागलों की एक तरह की। उनकी जिनकी जमीन, जंगल, घर सब सत्ता के दलाल तथा कंपनियों ने छिन लिए और जिन्हें विस्थापित जीवन जीने के लिए बाध्य किया गया उनकी तकलीफें अलग रंग की हैं। ‘तुम कदम – कदम पर खीजते थे / चाहते थे कि तुम्हारे घर तक आए पानी / सूखा न रहे बाथरूम का नल / सिर्फ जन्मदिन पर खरीदनी पङे मोमबत्ती... अक्सर नहीं आता पानी / गुल रहती है बिजली’ – ये गांव से लेकर नगरीय जीवन के रोजमर्रा के दुख हैं जो बेहद सघन अनुभूतियों के साथ व्यक्त हुए हैं। सङक पर निर्वस्त्र घुम रही स्त्रियों को कवि ने व्यापकता दी है कि वह हमारे समाज के दुख के साथ एकाकार हो गया है। साथ ही एक धिक्कार और आक्रोश का मिश्रित भाव भी बहुत ही तीखे रुप में उभरा है – ‘ये हम कैसे दोगले हैं जो नहीं जुटा पाए इनके लिए तीन गज कपङा’।
गीत की अ – राजनीतिक लगने वाली कविताएं भी गहरे अर्थों में राजनीतिक है। वे मरने वाली हर लङकी चाहे जन्मी हो या अजन्मी को एक साजिश का हिस्सा मानते हैं। मुंबई के जीवन और वहां पसरे लुम्पेनिकता को भी खोल के रख दिया है। ठगी के कारोबार बेपर्दा किया है। विस्थापित जीवन की विडम्बनाओं को सामने रखा है। गीत चतुर्वेदी ने कस्बाई जीवन से लेकर नगरीय जीवन और उसमें समायी वैश्विक समस्याओं तक के अनुभव के विस्तार को अपनी कविता में संवेदात्मक जगह दी है। 
          
पुस्तक – आलाप में गिरह
लेखक – गीत चतुर्वेदी
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य – 195 रुपए

 
           
 

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

नीचे धरती ऊपर आकाश

               
             बींसवी सदी के ढलते वर्षों में आत्मकथा ने विधागत स्तर पर एक नयी पहचान बनानी शुरु की। यह पहचान उसे हाशिए की संवेदना और स्वानुभूति की अभिव्यक्ति के कारण मिली। ‘नेम नॉट नोन’ सुनीलकुमार लवटे की ऐसी आत्मकथा है जो हाशिए की संवेदना, स्वानुभूति, वैचारिकी और आत्मकथ्य की परिधि को न सिर्फ बढ़ाती है बल्कि दृष्टि और आयाम के नये फलक को खोलती है। मुख्यतौर पर अभी तक दलित और कमोवेश आदिवासी आत्मकथाओं ने ही पहचान बनायी थी, लेकिन अब वेश्याओं, नौकरानियों और अनाथों की आत्मकथाओं ने इसके व्यास को चौङा कर दिया है। सुनीलकुमार लवटे अनाथाश्रम में जन्मे, पले और बङे हुए हैं। मां, बाप, रिश्तेदारों से विहीन उन्होंने एक नम्बर (संख्या) के रुप में रिमांड होम में अपराधी बच्चों के बीच अपनी आंखे खोली है। जिनके नाम की जगह लिखा था ‘नेम नॉट नोन’। लेकिन वे आज ‘वेलनोन’ सोशल एक्टिविस्ट, लेखक, अनुवादक, समीक्षक और प्राचार्य हैं। महज एक संख्या से चर्चित संज्ञा बनने के उनके संघर्षमय जीवन की जीवंत दास्तान को इस आत्मकथा में पढ़ा जा सकता है। लवटे लिखते हैं – ‘मेरी जमीन प्रश्नों से लबालब भरी थी। मेरे जन्म से पहले ही जन्मदाता पिता विश्वामित्र बन गए, इसलिए जन्म देनेवाली मॉ ने आजीवन कुंती बने रहना पसंद किया। इसी कारण मेरे नसीब में अनाथाश्रम की जिंदगी आई। मैं अनाथाश्रम में ही पला – बढ़ा... मेरी फाइल में मनुष्यता के कोई निशान नहीं थे... मैं था केवल पुरुष जाति का एक मामूली जीव... इसीलिए मेरा नाम नहीं था। पहचान के तौर पर केवल कोर्ट द्वारा दिया गया एक नंबर था... फाइल के अनुसार मैं ‘नेम नॉट नोन’ था। मूलत: मेरे मनुष्य होने को ही नकारनेवाले इस समाज ने मेरी उम्र तक एक्स – रे मशीन से तय की थी’।  
यह एक हीरोइक आत्मकथ्य है। समाज में फैले यथास्थितिवाद को तोङने वाला। संरचनात्मक स्तर पर बदलाव लाने के लिए अदम्य जिजीविषा का परिचय देने वाला। व्यवहारिक जीवनसंग्राम में कूदनेवाला। जीवन, कर्म और दृष्टि के बीच अटूट संबंध बनाने वाला। यही कारण है कि यह आत्मकथा दलित आत्मकथाओं से कई मायनों में अलग है। दलित आत्मकथाओं में लेखक का जीवनसंघर्ष, उसकी यातना, उपेक्षा, उत्पीङन का जिक्र तो मिलता है, यहां तक कि सफल होने और बेहतर मेट्रो जीवन जीने का भी। लेकिन अपनी स्वानुभूति को स्वविवेक में बदलकर उस कलुषित और उपेक्षित जीवन को बदलने के लिए ताउम्र संघर्ष करने की नहीं। प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष करना और बने - बनाये सांचे को तोङकर उसे बदल देना, साधारण बात नहीं है। सुनीलकुमार लवटे ने यह किया है जिसके विवरण और प्रमाण आत्मकथा में फैले हैं।
    सुनीलकुमार लवटे को जो जीवन हासिल था उसे वे इन शब्दों में परिभाषित करते हैं – नीचे धरती, ऊपर आकाश। दलित जीवन से भी उपेक्षित जीवन था उनका। या कहें अनाथों का जीवन दलितों से भी ज्यादा भयावह है। लवटे का जन्म सुमन नाम की कुवांरी मां की कोख से ऐसे आश्रम में हुआ जहां कोई कुवांरी माता होती, कोई विवाहेतर नाजायज संबंधों के कारण बनी माता होती तो कोई परित्यक्ता। जन्म देकर सुमन बच्चे को आश्रम के भरोसे छोङ गयी। तब उमाबाई ने अपने बच्चों के साथ इसे भी पाला – पोसा। आश्रम ही घर बना। यहीं पल रहे लङके और लङकियां भाई – बहन। नाते – रिश्तेदार। इन मुंहबोले रिश्तों में खून के रिश्ते से ज्यादा उष्मा और सहजता थी। जिसे समाज ने ठुकराया था, रिश्ते और संबंधों से अलगकर अभिशप्त जीवन दिया था उसे आश्रम ने जीवन दिया, लङखङाते पांवों को ताकत और अकृत्रिम संबंध भी। इन संबंधों को लवटे ताउम्र निभाते हैं। हर बार उसे मानवीय तरीके से परिभाषित करने की भी कोशिश करते हैं। साथ ही समाज में नक्कारा किस्म की जीवित संबंधों की जटिलता, तिकङम, स्वार्थ और अवसरवादी रवैये पर टिकी इस व्यवस्था की व्यंग्यगात्मक आलोचना भी करते हैं।  
हर समाज अपने उजाले के बीच अंधेरे को निष्पाप साबित करने के लिए ऐसे आश्रम या अनाथालय बनाकर रखता है जिसमें उसकी चादर उजली लगे। अनाथ बच्चों के जन्म की पूरी जबाबदेही स्त्रिओं के सिर मढ़ दी जाती है। फिर उसे आश्रम जैसे जगहों में नजरबंद कर दिया जाता है। आश्रम मर्दाना समाज की झूठी नैतिकता, प्रतिष्ठा और पवित्रता पर पर्दे डालने का काम करता है। लवटे आश्रम को करुणालय की संज्ञा इसीलिए देते हैं कि यह मानव अधिकारों से अपह्रत जिन्दगी को जीवन देता है। उपेक्षितों, वंचितों, यतिमों को अपनी कोख में पालता है / जगह देता है। लवटे आश्रम की आंतरिक संरचना की चर्चा करते हैं। और दैनिक जीवन में आनेवाली मुश्किलों तथा यांत्रिक जीवनशैली से पाठकों को रु – ब – रु कराते हैं। सामाजिक रुप से बहिष्कृत यह आश्रम, समाज के सभ्य लोगों के लिए महज एक अजायबघर से ज्यादा कुछ नहीं था / है। तथाकथित सभ्य लोगों द्वारा और सरकारी अनुदान से चलनेवाले इस आश्रम में लवटे का बचपन गुजरा। तीसरी कक्षा में दाखिले के वक्त लवटे को कोल्हापुर के रिमांड होम में ले जाया गया। रिमांड होम की संरचना आश्रम से भी भयावह थी। लगभग सैन्यीकृत ढंग की। आश्रम में मातृत्व की भावना थी जबकि रिमांड होम लगभग पितृसत्तात्मक। सफाई, भोजन, बर्तन, कपङे से लेकर टायलेट साफ करने और फर्श पोंछने तक का काम करना पङता था। सरकारी पैसे और संसाधन की लूट होती थी। और बच्चों को नारकीय जीवन जीने को मजबूर होना पङता था। रिमांड होम एक किस्म से जेल की कैदखाना थी। बाबजूद इसके लवटे ने अपना जीवन संघर्ष जारी रखा। प्राध्यापक उसके जीवन की ताकत बन कर उभरे। हर संभव मदद की। राष्ट्र निर्माण के उस दौर में प्राध्यापकों के अंदर नैतिकता और आदर्श भरे थे। नये भारत के निर्माण का सपना उनके मन में बसा था। पैसे, ज्ञान और सहानुभूति तीनों हासिल करने में लवटे सफल रहे। पढ़ाई आगे बढ़ती गयी और मुश्किलें आसान। मेहनत और विश्वास ने रंग दिखाया। अनाथाश्रम – रिमांड होम के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि लवटे को ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट’, कॉलेज डिग्री और ‘रोल ऑफ ऑनर’ की हैट्रिक हासिल हुई।
इन्हीं वर्षों में लवटे की रचनात्मकता ने जन्म लिया। साहित्यिक गोष्ठियों में शिरकत बढ़ी। वे प्राध्यापक बनने में सफल रहे। अब तक का संघर्ष सफल होने को दर्ज करती है। इसके बाद संघर्ष के ढंग में बदलाव आता है। चुनौतियां मुंह बाये खङी होती है। वे ऐसे स्कूल में प्राध्यापक बनते हैं जहां बुनियादी सुविधा तक हासिल नहीं है। यहां तक कि पढ़ने के लिए छात्रों को जमा करना, उन्हें स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित करने तक का भी काम करना पङता है। लेकिन उन्होंने लगन और मेहनत से सब कर दिखाया। प्राध्यापकीय व्यावहारिकता से निरंतर अपने ज्ञान, सोच और दृष्टि में परिवर्त्तन लाते गये। अपने जीवन में लगातार कैसे विकास किया जाए और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी बचाये रखा जाए इस दृष्टिकोण से भी आत्मकथा को पढ़ा जा सकता है।
लवटे ने स्कूल की मास्टरी करते हुए पीएच.डी की डिग्री हासिल की। संघर्ष का एक रुप यहां भी दिखता है। जिस स्कूल में पढ़ा वहीं टीचर हो गये। यह बहुत बङी उपलब्धि थी। स्कूल में आंतरिक लोकतंत्र कायम करने के लिए भी जद्दोजहद की। बाद में स्कूल की स्थायी नौकरी छोङकर अस्थायी रुप में कॉलेज ज्वाइन किया। जीवन के आदर्श को मूल्य की तरह मानते हुए आश्रम में ही पली-बढ़ी रेखा से विवाह किया। और धीरे – धीरे रिमांड होम के लिए काम करने लगे। इस आत्मकथा की ताकत यही है कि सफल होने के बाद भी लवटे में सफलता की मदहोशी नहीं छाई। उन्होंने अपनी दृष्टि और उर्जा को रिमांड होम को बेहतर बनाने में झोंक दिया। संस्था को मानवीय चेहरा प्रदान किया। नीरस जीवनशैली को तोङ नये रस का संचार किया। रिमांड होम को ‘घर’ का स्वरुप प्रदान किया। उसे मातृमयी बनाया। ममता के संचार से स्नेह – सहयोग बढ़ा। अब लोग नंबरों से नहीं, नाम से पुकारे और पहचाने जाते थे। यह मामूली परिवर्त्तन नहीं है। धीरे – धीरे उन्होंने रिमांड होम और उस जैसी अन्य संस्थाओं के नाम बदल दिए। नाम का बदलना दरअसल दृष्टि और विचारधारा का बदलना था। संस्था के भीतर नये युग के आगमन की सूचना थी। लवटे ने अपने प्रयास से उसे सांस्कृतिक केंद्र में बदलने की कोशिश की। उसमें भी सफल रहे। ऐसा भी वक्त आया जब संस्था को देश – विदेश से मदद मिलने लगी। बच्चों को गोद लिए जाने के लिए समारोह आयोजित किए जाने लगे। बच्चों को विदेश तक भेजा जाने लगा। अनाथ, उपेछित, बेसहारा बच्चे सनाथ होने लगे। उन्हें बेहतर जीवन और समाज मिलने लगा। वे सफल होकर डाक्टर, इंजीनियर, टीचर बनने लगे।
लेकिन संस्था को इस मुकाम तक पहुंचाने में लवटे ने अपना जीवन झोंक दिया। सामाजिक कार्यकर्ता के अनुभव के कारण उन्होंने सार्क बालिका वर्ष, बालन्याय अधिनियम, बच्चों की वैश्विक दशा, वंचित विकास, दत्तक समस्या, महिला मुक्ति, अपाहिज पुनर्वासन जैसे विषयों पर विशेषांक भी निकाला। सामाजिक सोच में बदलाव लाया। यही स्वानुभव और कर्मशीलता उन्हें अन्य आत्मकथाकारों से अलग करती है तथा दूसरों के सामने चुनौती के रुप में रखती है।
लवटे की इस आत्मकथा से गुजरते हुए हम संघर्ष और रचनात्मकता के जिस अद्वितीय मेल को यहां पढ़ते हैं वह असाधारण है। यह उम्मीद भी जगती है कि अभी सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है। राजनीति, भ्रष्टाचार, अवसरवाद और स्वार्थ ने सबकुछ निगल नहीं लिया है। इच्छाशक्ति, दृढ़निश्चय और दृष्टि हो तो अबूझ और लालफीताशाही के जटिलतंत्र के भीतर भी बदलाव की बयार बहाई जा सकती है। साहित्यिक और सामाजिक मोर्चे पर आज भी सुनीलकुमार लवटे सक्रिय हैं यह बेहद आश्वस्तिकारक और प्रीतिकर है। यह आत्मकथा आत्मप्रशंसा के लिए नहीं लिखा गया है दुष्यंत के शब्दों में कहें तो- ‘कोई हसीन नजारा तो है नजर के लिए’।             
पुस्तक - नेम नॉट नोन
लेखक – सुनीलकुमार लवटे
प्रकाशक - राधाकृष्ण, नयी दिल्ली
मूल्य - 250 रुपये

                                        राजकुमार

   

रविवार, मार्च 13, 2011

दलित साहित्य का फैलता कैनवस

 

मराठी दलित साहित्य ने साहित्यिक सौंदर्यशास्त्र का नया प्रतिमान गढ़ा है। वह जितनी अपनी रचनात्मकता के कारण चर्चित हुई उतनी ही साहित्य की अभेद स्थापित अभिजात्य मूल्यों के प्रतिरोध के कारण। उसने साहित्य की तमाम परंपरागत मानदंडों, प्रतिमानों, मूल्यों और उन विचार सरणियों को तोङने का काम किया जो वृहत्तर मानवीय मूल्यों के नाम पर सरहानीय थे लेकिन अपनी सोच के सीमित दायरे में लिपटे थे। उनका दायरा सीमित है यह बात भी दलित साहित्य से मिलने वाली चुनौतियों और तीखे प्रश्नों से उभरकर सामने आए। लेकिन यह कार्रवाई भी एकतरफा नहीं रही। दलित साहित्य और उसकी रचनात्मकता की विस्फोटक विधा ‘आत्मकथा(ओं)’ पर भी तीखे प्रहार किए गए। एक बहुत ही जरुरी सवाल यह उठा कि दलित आत्मकथाएं अपने जीवन के इर्द – गिर्द ही घुमती रहती है। वह वृहत्तर मानवीय दायरे को अपने भीतर नहीं समेटती है। आत्मश्लाघा से ग्रस्त है। समाज को बदलने वाले तमाम बङी अवधारणाओं और विचारों को रिजेक्ट करती है। निश्चित रूप से यह जरुरी सवाल हैं और इन सवालों को मराठी दलित साहित्यकार, चिंतक, अर्थशास्त्री और शिक्षाविद भालचंद्र मुणगेकर अपनी आत्मकथा “मेरी हकीकत” में ध्वस्त करते हैं।
“मेरी हकीकत” में भालचंद्र मुणगेकर के जीवन के शुरुआती दिनों के संघर्ष को अभिव्यक्ति मिली है। यह आत्मकथा लेखक के सफरनामे को पूरी तरह व्यक्त नहीं करता है। लेकिन मुम्बई विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार की योजना आयोग के सदस्य और इंडियन इंस्टीट्युट ऑफ एडवांस स्ट्डीज, शिमला के अध्यक्ष बनने के सफरनामे में जिन चीजों, घटनाओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों की भूमिका रही है सबको व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करती है।        
‘मेरी हकीकत’ में आत्मश्लाघा के अंश नहीं है। इसे ‘व्यक्ति पूजा’ की तरह भी नहीं पढ़ा जा सकता है। व्यक्तित्व का निर्माण एवं विकास का प्रक्षेपण इसमें जरुर है लेकिन वह उन तमाम हाशिए पर पङे लोगों और वंचित समाज के लिए आदर्श नजीर प्रस्तुत करती है जो भूख, अभाव और वर्णवादी दंश के भीतर जीवन जीते हैं। सुनील कुमार लवटे की मानें तो ‘यह आत्मकथा लेखक के होश संभालने तक के अठारह वर्ष की ऐसी विकासगाथा है जो ‘दलित’ सीमा को लांघकर मनुष्य़ की जिजीविषा का एक अदम्य स्त्रोत बनकर उभर आती है
यूं तो भालचंद्र के जीवन पर अन्य दलित लेखकों की तरह ही अम्बेडकर के जीवन और दर्शन का गहरा प्रभाव पङा है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि वे जिन पांच तत्वों से अपने जीवन को संचालित मानते हैं या जिसके आसपास अपने को मससूस करते हैं वे उन्हें चिंतन के स्तर पर राममनोहर लोहिया के नजदीक खङा करती है। यह और बात है कि आत्मकथाकर ने लोहिया का नाम नहीं लिया है। भालचंद्र जाति और अस्पृश्यता निर्मूलन, स्त्री – पुरुष समानता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक समाजवाद और मानवतावाद जैसे मूल्यों एवं तत्वों से अपने को संचालित महसूस करते हैं।
भालचंद्र इन मूल्यों के उल्लेख्य से कहीं न कहीं उन तर्कों का खंडन भी करते हैं जो यह कहता है कि दलित साहित्य अपनी परिधि और स्वयं के बनाये खोल से बाहर नहीं निकलता है। भालचंद्र का तर्क है कि ‘गुलामी मानवी समाज के विकास की अत्यंत मिलावटी और अनैतिक व्यवस्था है। मनुष्यों की खरीद बिक्री होना यानी उसका मनुष्यत्व को नकारना’ है। अस्पृश्यता गुलामी से भी बदतर बात है। भालचंद्र का कहना है कि जाति – व्यवस्था ने नैतिकता के सारे मानदंड को ध्वस्त कर दिया है। इसी की वजह से सत्ता, संपत्ति और प्रतिष्ठा के भीतर विषम विभाजन बना है। इसलिए इसका विरोध जरुरी है। इसके निर्मूलन के बगैर भारत एक सुसंस्कृत, अखंड और समर्थ राष्ट्र के रूप में खङा नहीं हो सकता।
भालचंद्र ज्योतिबा फूले की तरह ही स्त्री मुक्ति का सवाल उठाते हैं। उसके दुख – दर्द, अथक परिश्रम के प्रति करुणार्द्र हो उठते हैं। उन्हें पुरुषों की कष्ट की तुलना में स्त्रियों का कष्ट अधिक मूल्यवान लगता है। बहुभाषिक, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज में उन्हें धर्मनिरपेक्षता की बहुत जरुरत महसूस होती है। वे धर्मनिरपेक्षता की नयी परिभाषा गढ़ते हुए कहते हैं कि विवेक, संयम, सहनशीलता और दूसरों के प्रति आदर का भाव ही धर्मनिरपेक्षता है।
प्रजातांत्रिक समाजवाद में विश्वास रखने वाले भालचंद्र मानते हैं कि भूख, बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी से मुक्ति ही स्वतंत्रता है। यही आत्मसम्मान है। आर्थिक विषमता की खाई पाटे बगैर और हर व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा दिए बगैर राजकीय प्रजातंत्र को हासिल नहीं किया जा सकता है। यह हमारे सामने एक कठिन चुनौती है जिससे लङना ही होगा। मानवी समाज से प्रेम करना ही मानवतावाद है। लेकिन जाति, वर्ण, क्षेत्र, रंग, धर्म, अलग संस्कृति में विभाजित हमारा समाज भातृत्व प्रेम को सहेज नहीं रहा है। संसाधनों पर कब्जे की लङाई, राष्ट्र के प्रति अनुदारता युद्ध, दंगे आतंकवाद आदि इसे भंग करते रहते हैं। भालचंद्र एक राष्ट्रवादी विमर्शकार की तरह इससे लङने की चुनौती को सामने रखते हैं।
भालचंद्र अपने जीवन में उभरे इन मूल्यों को तीन बातों से निर्मित मानते हैं। पहला, पिता की व्यक्तिगत जीवन। दूसरा, गुरु और तीसरा मराठी साहित्य। भालचंद्र मानते हैं कि मेरे पहले गुरु मेरे पिता हैं। वहीं मेरे जीवन के शिल्पकार हैं। वे अपने उन सगे संबंधियों को भी याद करते हैं जिन्होंने इनके जीवन को बनाने में बहुत त्याग किया है। वे शरतचंद्र, अनंतराव चित्रे, बा.बा. ठाकुर और लीला आवटे आदि शिक्षकों के प्रति भी असीम श्रद्धा से भरे हैं जिन्होंने इनके जीवन को दिशा दी। गुरु की महत्ता को इन्होंने पूरी ताकत से स्थापित किया है। जो इन दिनों विरल होती जा रही है। अच्छा अर्थशास्त्री बनने की बात उन्होंने अपने गुरुओं से ही सिखी। वे मानसिक भावविश्व के निर्माण का श्रेय मराठी साहित्य को देते हैं।
दुख, दारिद्रय, अभाव, भूख, जातिय - वर्णवादी दंश के बीच ही बचपन में किसी व्यक्ति के मानसिक गठन का निर्माण कैसे होता है? वह किन – किन चुनौतियों और सवालों से टकराता है? उपेक्षित और कमतर मनुष्य होने का भाव कैसे उसके विशाल मानस को तोङती है? कुंठाओं की एक भयावह दुनिया कैसे अस्तित्व में आती है? ये बेहद बेचैन करने वाले प्रश्न हैं। भालचंद्र मुणगेकर का नैरेटर इन सवालों से न जूझता आया है बल्कि उसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी आत्मकथा के माध्यम से सामने लाया है। कुल मिलाकर कहें तो यह आत्मकथा दलित साहित्य के कैनवास को फैला देता है।

                                                                  पुस्तक – मेरी हकीकत
                           लेखक – भालचंद्र मुणगेकर

रविवार, जनवरी 30, 2011

गांधी का पुनर्मूल्यांकन


      पश्चिमी आधुनिकता के अंतर्विरोध जैसे 2 तेजी से उभरकर सामने आ रहे हैं, गांधीजी की प्रसांगिकता पर बहसें तेज हो रही हैं। उनकी दृष्टि और सभ्यता समीक्षा का पुनर्मूल्यांकन   हो रहा है। यह पहले भी होता रहा है। लेकिन अब आर्थिक – राजनीतिक – सांस्कृतिक – प्रौद्योगिकी जटिलताएं बढ़ती जा रही हैं। आज का मनुष्य समुदाय पर्यावरण, आतंकवाद, हिंसा, भ्रष्टाचार, वित्तीय पूंजीवाद के साम्राज्यवादी स्वरुप, साप्रंदायिकता, सभ्यताओं का संघर्ष, उपभोक्तावाद का दुश्चक्र, भाषाओं के एकरुपीकरण आदि का गहरे शिकार हुआ है। ऐसे में समाधान का एक रास्ता गांधी के चिंतन, दर्शन, कर्म से होकर निकलता है। इसलिए वे हमारे लिए फिर से प्रसांगिक बन गए हैं। विश्वनाथ तिवारी द्वारा संपादित (सहस्त्राब्द का महानायक)  पुस्तक में सहस्त्राब्द के महानायक की भव्यमूर्ति को फिर से विश्लेषित – स्थापित किया गया है।
       विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने अपने निबंध ‘कर्मयोगी महात्मा’ में गांधी को ‘निशस्त्र मसीहा’ साबित करते हुए लिखा है कि गांधी के स्वराज की कल्पना राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक थी। वे न्यूनतम उपभोग पर बल देते थे। जबकि आज का समाज उपभोग की अनंतता की ओर बढ़ रहा है। गांधी के लिए धर्म का अर्थ था ‘जो आप अपने लिए चाहते हैं, वही दूसरे के लिए करें’। विश्वनाथ प्रसाद गांधी और मार्क्स की तुलना करते हुए मार्क्स पर कई सवाल उठाते हैं। वे लिखते हैं कि गांधी चिंतन में मनुष्य के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आयामों के साथ एक आध्यात्मिक उपाय भी है। मार्क्स के लिए आध्यात्मिकता का क्षेत्र वर्जित है। गांधी ईश्वर में, धर्म में और व्यक्ति की निजी नैतिकता में विश्वास रखते हैं। मार्क्स ईश्वर, धर्म, आत्मा का निषेध करते हैं। और व्यक्तिगत नैतिकता की उनकी अवधारणा गांधी से बिल्कुल अलग है।... मार्क्स का सिद्वांत शोषक वर्ग के प्रति घृणा और गुस्से से पैदा हुआ था। गांधी का बल सत्याग्रह पर था जबकि मार्क्स का संघर्ष पर। विश्नाथ प्रसाद का यह विवेचन काफी हद तक सब्जेक्टिव है। नैतिकता, करुणा, और आर्थिक आध्यात्मिकता मार्क्स में भी है। यह कहना भी बेमानी और यथार्थ से दूर है कि ‘यदि गांधी न होते तो भारत में दलित चेतना की शुरूआत भी न होती। ज्योतिबा फूले, अछूतानन्द, अम्बेडकर आदि ने दलित चेतना की अलख जगायी है। गांधी ने अछूतोद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, इस सच से मुंह नहीं मोङा जा सकता है। वर्ण-व्यवस्था या जाति- व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन चलाना या तोङना गांधी का प्राथमिक उद्देश्य नहीं था। अम्बेडकर का बलाघात जरूर इस बात पर था कि जब तक सामाजिक - धार्मिक सुधार नहीं  अर्थात ‘सामाजिक स्वराज’ हासिल नहीं हो जाता ‘राजनीतिक स्वराज’ बेमानी होगी।
रामकृष्ण्मणि त्रिपाठी ने ‘गांधी के साथ: इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर’ में गांधी के स्वराज के पांच अर्थों को खोलने की कोशिश की है। पहला, अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दूसरा, राजनीतिक स्वतंत्रताएं तीसरा, आर्थिक स्वतंत्रताएं चौथा, सांस्कृतिक दासता से मुक्ति पांचवा, आत्मानुशासन। चन्द्रशेखर धर्माधिकारी ने इस बात पर बल दिया है कि आज लोकतंत्र में ‘लोक’ गायब हो गया है और ‘तंत्र’ अधिक मजबूत हो गया है। गांधी इसके उलट चाहते थे। ‘गांधीवध’ शब्द पर आपत्ति करते हुए लिखा है- वध राक्षसों, दुष्टों का होता है न कि महामानवों का। वे सामाजिक मसले पर अम्बेडकर और गांधी में पूरकता का भाव देखते हैं। अपने निबंध में रमेशचंद्र शाह इस बात पर बल देते हैं कि हमें ‘हिन्द-स्वराज’ से ‘सांस्कृतिक आत्मविश्वास’ जज्ब करना चाहिए।
       इंद्रनाथ चौधुरी हिन्द-स्वराज को आधुनिक विश्व प्रणाली की समीक्षा मानते हैं। गांधी कानून के खिलाफ नहीं थे लेकिन वह समस्या का समाधान नहीं है, इसे पूरी ताकत से कहते थे। संसद और संविधान ने अस्पृश्यता और दहेज प्रथा खत्म कर दी लेकिन वह समाज में बरकरार है। चौधुरी यह निष्कर्ष भी देते हैं कि किसानों या हाशिए पर रहने वालों का पक्ष लेकर राजनीति को ‘गैर-बौद्विक’ करना चाहते थे हालांकि वे बौद्विकता विरोधी नहीं थे। बौद्विकतायुक्त विदेशी आधुनिकता के विरोधी थे। किसानों, मजदूरों, स्त्रियों,  हरिजनों आदि को आगे लाना ही ब्राह्मणवाद का विरोध है। वे सरलता और धीमेपन में सौंदर्य खोजना चाहते थे।
      नन्दकिशोर आचार्य ‘गांधीवाद : गांधी के बाद’ निबंध में लोहिया, जेपी, बिनोबा की विचारधारा, चिंतन एवं कर्म की समीक्षा करते हुए अहिंसक समाज बनाने पर बल देते हैं। वे मानते हैं गांधी के संपूर्ण जीवन और चिंतन का लक्ष्य एक अहिंसक समाज की रचना कहा जा सकता है और मोटे तौर पर इस अहिंसक समाज के तीन मुख्य आधार माने जा सकते हैं- राजनीतिक विकेंद्रीकरण, आर्थिक विकेंद्रीकरण और इन्हें प्राप्त करने के लिए सत्याग्रह । चौखंभा राज, सिविल नाफरमानी, सर्वोदय आदि उसी के रुप हैं। यह तभी होगा जब लोकशिक्षण के साथ - साथ अहिंसक संघर्ष भी किया जाए। लेकिन क्या हमारा समाज इसके लिए तैयार है? विद्यानिवास मिश्र गांधीजी की सौंदर्यदृष्टि को उपयोगितावादी मानते हैं। गोयनका ने गांधीजी को प्रेमचंद की आंखों से देखा है। राजेन्द्र उपाध्याय ने भारतीय और उमाकांत मालवीय ने विदेशी साहित्य में उपलब्ध गांधी की छवि को उकेरा है। सिद्धेश्वर प्रसाद ने ‘साक्षी – पुरुष’ गांधी को भारतीय इतिहास और परंपरा के बीच रखकर मूल्यांकन किया है। कुल मिलाकर यह पुस्तक गांधी को अनेक आयामों में देखने - समझने की दृष्टि देती है।   

रविवार, जनवरी 16, 2011

निजी और दुनियावी दुखों के अक्स

         हिन्दी साहित्य में नौकरशाही, अफसरी या सत्ता, प्रशासन से जुङे लेखकों – कवियों को लगभग हिकारत की नजर से देखा जाता रहा है। वामपंथी आलोचना ने उन्हें हमेशा अलग – थलग रखने का प्रयास भी किया है। यह और बात है कि श्रीलाल शुक्ल, अशोक वाजपेयी, सुदीप बनर्जी से लेकर पंकज राग तक ने न सिर्फ लेखनी से बल्कि अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों, कार्यक्रमों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। उनके महत्वपूर्ण अवदान पर विचार करें तो हिन्दी साहित्य के इतिहास की तस्वीर थोङी बदल जाए। उन्होंने काव्यानुभवों के कई रंग बिखेरे हैं। सुदीप बनर्जी उन्हीं लेखकों में शुमार हैं जिन्होंने ताउम्र भारतीय प्रशासनिक सेवा से जुङे रहे रहकर काव्य सर्जना की है। अब तक सुदीप बनर्जी की चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। काव्यानुभवों का अनूठा विस्तार उनके पहले संग्रह ‘शब-गश्त’ से लेकर नये संग्रह ‘उसे लौट आना चाहिए’ तक में पढ़ा जा सकता है।
      सुदीप का यह संग्रह उनकी मृत्यु के पश्चात विष्णु नागर और लीलाधर मंडलोई के संयोजन में निकला है। यह संग्रह देखकर सुदीप के पाठकों को सुखद अनुभूति होगी कि उनकी मृत्यु के तुरंत बाद ही इसका प्रकाशन हो गया। इसे बेहद मनोयोग से और सुसंबद्ध तरीके से प्रकाशित किया गया है। दोनों ने ही ‘इन कविताओं के बहाने’ उन पर कलम चलायी है। यह एक किस्म से श्रदांजलि भी है और उनकी कविताओं के मर्म को पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश भी।
      आमतौर पर यह देखने में आता है कि प्रशासन से जुङे लोग राजनीतिक कविताएं लिखने से बचते हैं या अपनी कविताओं में इतना अमूर्तन गढ़ देते हैं कि उसकी धार कुंद हो जाए। यहां तक कि अपनी प्रतिबद्धता की दीवार भी इतनी महीन रखते हैं कि पता ही नहीं चले कि किस जमीन से खङे होकर बात कर रहे हैं। लेकिन सुदीप ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की है। बिना लाग – लपेट के बेखौफ अपने अनुभवों को दर्ज किया है। इस संग्रह की शुरुआती कुछ कविताएं बेहद स्पष्ट तौर पर राजनीतिक हैं। उन्होंने तत्कालीन संप्रदायिक, क्रूरतापूर्ण राजनीति पर तीखे प्रहार किए हैं। वैश्विक स्तर पर चल रही हत्यारी राजनीतिक गतिविधियों को भी उघाङा है। वे ‘इराक – 1’ और ‘इराक – 2’ में अमेरिकी दादागिरी, बेकसूरों पर उसकी नृशंस हत्याओं को तो खोला ही है साथ ही भारतीय राजनीतिक प्रतिबद्धता पर भी उंगली उठायी है। वैसी प्रतिबद्धता जो नक्कारखाने की तूती की तरह है।
ये कविताएं एकध्रुवीय दुनिया के विरोध में नैतिक ताकत और साहस के साथ लिखी गयी हैं। इस स्पष्ट दृष्टि और अवधारणा के साथ भी कि –‘इराक़ – अफगानिस्तान तो झांकी है / हिन्दुस्तान – पाकिस्तान बाकी है’। लगभग नारे की शैली में लिखी यह कविता अमेरिकी रणनीति एवं एजेण्डे का खुलासा करती है। यह भी बताती चलती है कि अमेरिकी साम्राज्य दुनिया भर में सिर्फ हथियारों के बल पर नहीं पहुंच रही बल्कि संस्कृति, बाजार, पूंजी और विज्ञान के दम पर भी अलग – अलग रुप धर कर आ रही है। हिरोशिमा, भोपाल, कश्मीर से लेकर काबुल और बगदाद पहुंचने के लिए उसने अलग – अलग तरीके और हथकंडे अपनाए हैं। लेकिन हमारी राजनीति उसकी पिछल्गू बन उसके सामने शीर्षासन कर रही है। वे अपने विरोध में उठे हर लामबंद हाथ का काट जानते हैं। जरुरत पङने पर ‘दुधमुंहे बच्चों के मुख में / कोका – कोला उंडेलकर / वे लामबंद कर लेते हैं / आतंकवाद के विरुद्ध / विश्वव्यापी अभियान में’।
वे बुश, आडवाणी और नरेन्द्र मोदी को एक ही पंक्ति में रखकर साम्राज्यवाद, संप्रदायिकता और विकास के उलझे और फरेबी राजनीति का भी खुलासा करते हैं –‘बुश जी खुश जी / दुनियाभर में / एकमात्र पुरुष जी / गुजरात में कभी छुप कर / कभी खुल कर / अपनी भारत माता के / लौह और विकास पुरुष जी / बुश जी खुश जी / आप नहीं परपुरुष जी’। वे बुश की राजनीतिक हरकतों में हिटलर के फासीवादी चेहरे को भी पढ़ने की कोशिश करते हैं। लिखते हैं –‘बङी मेहरबानी कि उन्होंने अपना नाम / बुश रखा, वे खुद को कहते हिटलर / तो आप क्या कर लेते?’ सुदीप की यह कविता निरा गद्य होने का जोखिम तो उठाती ही है, सौंदर्यहीनता और तात्कालिता की भी। इस तरह के खतरे की परंपरा उन्हें नागार्जुन के साथ जोङती है।
सुदीप को लगता है कि जमाने की चाल बेडौल हो गयी है। दुनिया को रोड रोलर से समतल बनाया जा रहा है। हाशिए पर खङा व्यक्ति भी इस षड्यंत्र को समझता है लेकिन उसे विवश कर दिया गया है। भारत फिर से अपनी दुर्दशा पर रो रहा है। समस्याएं हैं कि बढ़ती जा रही है। लोगों का दुख बढ़ रहा है। सुदीप का लेखक इन दुखों से घिरा बेचैनी महसूस करता है। इनसे बाहर निकल आने का आत्मसंघर्ष भी जहां – तहां नज़र आता है। कहीं – कहीं आत्मधिक्कार मुक्तिबोध की कविताओं की याद दिलाती है। मुक्तिबोध का प्रभाव तो इस हद तक दिखाई पङती है कि उसके छाया रुपों को पढ़ा जा सकता है।
सुदीप की कुछ कविताएं उन दिनों की है जिन दिनों वे कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से जूझ रहे थे। विष्णु नागर के हवाले से कहें तो ये कविताएं हिन्दी साहित्य की उपलब्धि हैं। उन्होंने अपने ‘दुख को नायक’ न बनने दी। जबकि मृत्यु की त्रासदी और उससे लङने की आत्मसंघर्ष से बुनी कविताएं हैं। उन्हें अपने न होने की परवाह उतनी नहीं है जितनी दायित्वों के पूरे नहीं होने के। ‘अस्पताल में वे कितने / सिर्फ अपने सहारे बीमार / उनके साथ आती अस्पताल तक / केवल उनके घर छोङी हुई समस्याओं की फेहरिस्त... या जो छोङ आए काम – उनकी तरफ / वे तय नहीं कर पाते / और इस असाध्य बीमारी की यंत्रणा से / थोङा बच जाते’। अपनी मृत्यु की भयावहता, दुख, संत्रास, पीङा को जिन शब्दों में उन्होंने आवाज दी है वह जिजीविषा लंबे समय तक याद रखी जायेंगी। मृत्यु की अवधारणा को भी पुनर्परिभाषित करने की कोशिश है। मृत्युबोध से जुङी कविताओं में एक तरफ जमाने के सामने कंफेशन है तो दूसरी तरफ अपनी छोटी भूमिका की सार्थकता का आत्मविश्वास भी। 
    

गुरुवार, दिसंबर 30, 2010

ग़ज़ल

हिन्दी के महान लेखक रघुवीर सहाय को हम उनके ग़ज़लों के लिए नहीं याद करते। आज उनकी बींसवी बरसी पर अमरबेल आपसे एक ग़ज़ल साझा करता है ----------

खोल दो अब द्वार प्रेयसि, प्रात का
मुक्त हो बन्दी अभागिन रात का।
जानता हूं किस लिए बिखरा तिमिर
क्योंकि खिलता था ह्रदय जलजात का।
तप्त है ज्वर से उजाले का बदन
उष्ण है स्पर्श तेरे गात का।
प्रीत की वह रीत पिछ्ली भूल जा
यह नहीं अवसर निठुर आघात का।
कौन कहता है कहानी प्यार की,
यह तुम्हें उत्तर तुम्हारी बात का।