सोमवार, सितंबर 13, 2010

ग्राउंड ज़ीरो के तनाव

ग्राउंड ज़ीरो के नजदीक मस्जिद तथा इस्लामिक सेंटर का निर्माण अब एक सांस्कृतिक युद्ध में तब्दील हो चुका है | इस सांस्कृतिक युद्ध के परिदृश्य में कई वादी और प्रतिवादी एक साथ आमने-सामने हैं | इसमें जहाँ आम न्यू-योर्कर अपनी भूमिका को सारी दुनिया के सामने बेबाकी से प्रकट कर रहा है, वहीँ अमरीकी शासन अपने अंतर्विरोधों के साथ दबाव में आता दिखता है | इसके अलावा इस मुद्दे पर ग्लोबल तथा पारंपरिक मुसलमानों के छिपे हुए तनाव भी प्रकट होते हैं |
                                       9/11 के हमले के बाद से प्रतिक्रिया स्वरुप जो राजनितिक एवं सामरिक हमले मुस्लिम देशों में हथियारों की खोज तथा अपराधियों की धरपकड़ के नाम पर हुए, उनसे मूलतः विकसित देशो के मुसलमानों के जीवन और उनकी अस्मिता के प्रति खतरे का भावबोध पैदा हुआ | इन देशों के गैर – मुसलमान नागरिकों में यह समझ विकसित ही नहीं हो पाई की हर मुसलमान ओसामा नहीं होता और इस कारण एक सांस्कृतिक,राजनितिक और सामाजिक अलगाव की धारणा पनपने लगी | इस समस्या से निपटने के लिए इन समाजों के मुसलमानों के पास यही रास्ता था कि वे अपनी एक पुख्ता ग्लोबल छवि पेश करें तथा यह सन्देश दें कि इस्लाम आतंकवाद का पर्याय नहीं है,वह तो विश्व में शांतिपूर्वक भागीदारी का धर्म है | इसी सोच के कारण यह समझ आता है कि ग्राउंड ज़ीरो के पास जिस स्थल पर मस्जिद प्रस्तावित है, वहाँ पर एक इस्लामिक सेंटर बनाने कि योजना भी है | इस जगह का नाम कोर्डोबा हाउस रखने की योजना है, जिसमे मस्जिद के अलावा स्विमिंग पूल, बास्केट बाल कोर्ट, सम्मलेन कक्ष, पाँच सौ लोगों कि क्षमता का सभागार, शादी-ब्याह सरीखे आयोजनों कि सुविधा, थिएटर, कला प्रदर्शनी तथा रसोई-कला के प्रावधान की बातें शामिल हैं | कहने की आवश्यकता नहीं कि यदि यह सब इस्लामिक सेंटर के लिए प्रस्तावित योजना में शामिल है, तो यह उसके ग्लोबल स्वरुप को ही सबके सामने लाने का प्रयास है | इस्लामिक सेंटर का यह चित्रण उस तालिबानी संस्कृति के बिलकुल विपरीत है, जहाँ फुटबाल, संचार माध्यम, दाढ़ी की अनिवार्यता, कला विरोध, तथा शरीर को पूरी तरह ढँकने की अनिवार्यता लिए होता था | इस्लाम के इस नये ग्लोबल चेहरे को उभारने में स्वयं मार्केटवादी मीडिया व्यवस्था ने भी अपना भरपूर योगदान दिया जिसका एक प्रबल उदाहरण शाहरुख खान की बहुचर्चित फिल्म ‘माई नेम इज़ खान’ है | इस फिल्म के एक दृश्य में तो इसका नायक रिज़वान खान एक अमरीकी मस्जिद में उस डॉकटर मुसलमान से लड़ता हुआ नज़र आता है, जो मिथक का सहारा लेकर वहाँ मौजूद बाकी मुसलमानों को आतंकवाद के लिए भ्रमित करने का काम कर रहा होता है | रिज़वान खान उसकी मिथकीय व्याख्या को सही करता हुआ उस डॉक्टर मुसलमान पर कंकड़ फेंकता है, और उसे शैतान की छवि देता है | यहाँ पर शैतान पर पत्थर फेंकने कि परंपरा अपनी नयी व्याख्या के साथ सामने आती है, जिसका पालन आज भी हज के दौरान किया जाता है | इसी फिल्म में रिज़वान की भाभी भी जब हिज़ाब को खुले आम पहनती है, तो बजाय वह धार्मिक चिह्न के, मुस्लिम स्त्री के आत्म विश्वास का प्रतीक बन जाता है | इसके अलावा रिज़वान की यात्रा का उद्देश्य ही यह होता है, कि वह प्रेसिडेंट ओबामा से मिले और उन्हें आत्म विश्वास और निडरता के साथ यह सन्देश दे कि ‘माई नेम इज़ खान एंड आई एम नौट अ टेररिस्ट’ | अत: इस निष्कर्ष पर पहुँचना गलत नहीं है कि ग्लोबल इस्लामिक  की एक ऐसी छवि प्रस्तुत हो रही है जो आज की दुनिया में बिना भेदभाव के अपनी सहभागिता चाहता है और परंपराओं की अपनी एक नवीन व्याख्या पेश करता है |     
                                       लेकिन गैर – मुसलमान ग्लोबल अमरीकी या न्यू योर्कर, ग्लोबल इस्लाम के इस नये रूप को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है | वह तो खुलेआम यह धारणा व्यक्त कर रहा है कि ‘ग्राउंड ज़ीरो’ वास्तव में उसके लिए अमरीकी राष्ट्रवाद का प्रतीक है | वह उसके लिए एक पवित्र स्थान है, जिसके पास वह उस आतंकवादी धर्म के केंद्र को बर्दाश्त नहीं कर सकता, जिसके आधार पर उसके देश की पहचान ‘ट्विन टॉवर्स’ को गिरा दिया गया था | मस्जिद और इस्लामिक सेंटर के विरोध में जो सन्देश इन लोगों द्वारा दिए गए, उनमे से एक यह था कि ग्राउंड ज़ीरो पर मस्जिद बनाना 9/11 के हमले में शहीद हुए हमले की कब्र पर थूकने और उन्हें अपमानित करने के समान है | ज़ाहिर है कि यहाँ पर धर्मं बनाम राष्ट्र के तनाव की स्थिति पैदा कर दी गयी है | लेकिन इस तनाव में इस पर कोई विचार नहीं है कि 9/11 के हमले में मुसलमान भी मारे गए थे | दूसरे शब्दों में यह हमला किसी एक धर्मं या सम्प्रदाय के लोगों पर ही था, यह नहीं कहा जा सकता | परन्तु इतना तो ग्लोबल अमरीकी के लिए अवश्य विचारणीय होना ही चाहिए कि जिस हमले की वजह से ग्राउंड ज़ीरो की पहचान बनी है, उसमे इस्लाम को मानने वाले लोग भी मारे गए थे और इस कारण उन शहीदों के धर्मं से सम्बंधित एक केंद्र बनाया जा रहा है, तो उन्हें आपत्ति नहीं होनी चाहिए | इसके ठीक उलट वहाँ पर तो सर्वेक्षणों के द्वारा यही सिद्ध हो रहा है कि न्यू योर्क के तिरसठ प्रतिशत लोग इस विचार के हैं कि ग्राउंड ज़ीरो के पास मस्जिद या इस्लामिक केंद्र का निर्माण नहीं होना चाहिए और सत्ताईस प्रतिशत लोग इसके पक्ष में हैं | इतना ही नहीं, अमरीकी राष्ट्रवाद इतना उग्र रूप धारण कर चुका है कि फ्लोरिडा की एक मस्जिद को पाइप बम से ध्वस्त करने के प्रयास की खबर भी आई है | इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि ग्लोबल अमरीकी राष्ट्रवादियों के लिए मस्जिद एक भयानक जगह के रूप में चिह्नित होती है, और वे इस भय के आवेश में आकर ही अपने राष्ट्र का सुकून खोने की राह पर अग्रसर हैं | यह उनके विकसित होने के भ्रम को भी तोड़ता  है| अन्य को ना बर्दाश्त कर पाने कि यह स्थिति भी अमरीका के आंतरिक हालात के खतरे कि ओर कूच करने का संकेत हैं | पर, इतना तो तय है कि उनके लिए ग्लोबल हो या पारंपरिक, मुसलमानों के नागरिक सरोकारों से कुछ भी लेना – देना नहीं है |
                                         इस प्रकार मोटे रूप से जो चित्र सामने आता है, वह यही बयाँ करता है कि अमरीका के भीतर ग्लोबल बनाम ग्लोबल के विवाद की गंभीर स्थिति का आधार मौजूद है | ऐसे समय में अमरीकी प्रशासन की दुविधा भी सामने आती है | एकतरफ जहाँ उसे अपने संविधान के उस मूल कथ्य की रक्षा करनी है, कि अमरीका में किसी भी धर्मं का परिचालन अथवा मस्जिद निर्माण गैर क़ानूनी नहीं है, वहीँ, दूसरी ओर उसे यह भी देखना है कि उसके ग्लोबल अमरीकी नागरिक उससे खफा न हों | यह दुविधा ही वह मूल कारण है, जिसने राष्ट्रपति ओबामा तक को द्वंद्वात्मक स्थिति में ला दिया है | किसी भी एक ग्लोबल के लिए खुलकर पक्ष में आना उनके लिए लोहे के चने चबाने के समान है | यही कारण है कि ओबामा द्वारा दी गयी एक रोज़ा इफ़्तार पार्टी में यह कहने के बावजूद कि अमरीका में मुसलमानों को इस्लामिक सेंटर बनाने का अधिकार है, उन्हें ‘कोर्डोबा हाउस’ में मस्जिद बनाने पर अपनी निष्पक्षता ज़ाहिर करनी पड़ी | उन्होंने यह स्पष्ट कहा है कि अमरीका में धार्मिक स्वतंत्रता के चुनाव तथा उसके पालन के अधिकार को कोई चुनौती नहीं दे सकता, लेकिन इसके साथ ही अपने व्यक्तव्य के अर्थ को संकुचित करते हुए तथा सन्दर्भ देते हुए उन्होंने कहा है कि इसे ग्राउंड ज़ीरो से जोड़कर कदापि न देखा जाय | इसके साथ ही उनका यह भी  बताना कि भविष्य में भी वे ‘ग्राउंड ज़ीरो’ के निकट मस्जिद बनाने पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे, साबित करता है कि यह मुद्दा उनके लिए कॉटो भरा रास्ता ही है | इस प्रसंग में ओबामा के अतिरिक्त न्यू योर्क तथा अलास्का के गवर्नर भी मुखरित हुए हैं | न्यू योर्क के गवर्नर डेविड पैटरसन ने तो मस्जिद निर्माण के लिए वैकल्पिक स्थान के सुझाव पर विचार करने की बात कही है | उनका यही मानना है कि वे मस्जिद न बनाने के पक्ष में तो नहीं है, लेकिन आम न्यू योर्कर की भावनाओं का ख्याल करते हुए उसे ग्राउंड ज़ीरो पर नहीं बनाना चाहिए | पैटरसन कि इस सोच से स्पष्ट हो जाता है कि एक गवर्नर की हैसियत से वे भी इसी दबाव का सामना कर रहे हैं, लेकिन वे अधिक मुखर हैं | इनके अलावा अलास्का की गवर्नर सारा पौलिन ने तो ग्लोबल मुसलामानों से सीधे यह अपील की है कि उन्हें यह समझना चाहिए कि ग्राउंड ज़ीरो के पास मस्जिद का निर्माण अनाधिकार चेष्टा है | दूसरे शब्दों में तो वे खुलकर इस विवाद को एकपक्षीय ही बना रही हैं, और उन पर अमरीका के संविधान का कोई दबाव नहीं दिखता | इसे, यदि राजनीती के तहत समझा जाए, तो यह स्पष्ट समझ आता है कि यह मुद्दा एक ग्लोबल जन समाज में संविधान पर विचार किये बगैर अपनी लोकप्रियता में इजाफा करने का सुनहरा मौका भी देता है |   
                                               -   अरुणाकर पाण्डेय ,
                                                   9910808735,
                                                                                                                  arunakarpandey@yahoo.co.in
                                                                                                              
                                                 

                    
                                                

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